प्रतिक्षा

स्त्री के प्रतीक्षा का मर्म बताती, एक कविता बिहार से


प्राची मूल रूप से समस्तीपुर की हैं और कुछ सालों से दिल्ली में रह रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद फिलहाल प्राची वहीं से हिन्दी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर कर रही हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर वह हमेशा से ही क्रिएटिव राइटिंग क्लबों से जुड़ी रही हैं और अपनी लेखनी से अपनी मौजूदगी का एहसास कराती रही हैं। अपने लेखन में प्राची अपनी सारी आधुनिकता समाहित करने के बावजूद एक देसीपन का छुअन छोड़ जाती हैं। उनकी कविताओं में दिल्ली की बेफिक्री के साथ मिथिला की संजीदगी भी बराबर की हिस्सेदार है। इसीलिए अपने बारे में जब प्राची खुद को “सोशली अनसोशल” कहती हैं तब इस बेफिक्री और संजीदगी का मिश्रण देखा जा सकता है। इनकी कविताओं का विषय अक्सर स्त्रीमय और देसी होता है। इनकी कविताओं में नारीवाद, देसीपन और शहरी नजरिए का खुबसूरत नज़ारा दिखता है।

प्रतिक्षा

तो आइए, इस हफ्ते “एक कविता बिहार से” में पढ़ते हैं प्राची कश्यप की कविता “प्रतीक्षा” –
मैं न लिख सकूँ
प्रेम की श्रेष्ठ कविता
शायद उसमें न डाल सकूँ
सिहरन पैदा करने वाली उपमायें
मगर तुम रखना स्मरण
इन उपमाओं ने कागज खुरचते वक़्त
दिया होगा तमाम सिहरनों को जन्म
जगाए होंगे कितने ही मर्म
मर्म,जिनकी नियति है
न पहुँच पाना तुम्हारी देहरी तक
वे हर उस सफर में हुए हैं नाकाम
जो उन्हें पहुँचाते तुम तक
मर्म और सफर से परे
मैं शायद निर्धारित न कर सकूँ
अपनी प्रतीक्षा के पलों लिए कोई पैमाना
न बता पाऊँ तुम्हें की
प्रतिक्षाओं संग होती है अग्नि ज्वाला
जो जलाती हैं मुझे तुम्हें अनवरत
प्रतिक्षाएँ संग होती है वायु
जो सहलाती हैं नाज़ुक पलों में
उद्वेग में उसकी गति लाती है विनाश
प्रतिक्षाओं में होती है थोड़ी सी नमीं भी
जिनसे है सौंधेपन की खुशबू
प्रतिक्षाएँ लायीं है अपने संग रतजगे
और कुछ लाली, लज्जा और रोष की!
–  प्राची कश्यप

 

 


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― Nina Hrusa




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Mayank Jha

Mayank Jha is a 20 something years old content writer and an English major. A writer by day and reader by night, he is loathe to discuss about himself but can be persuaded to do so from time to time.