बिस्मिल अज़ीमाबादी

तो ‘सरफ़रोशी की तमन्ना..’ एक बिहारी बिस्मिल ने लिखी है !!

है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर।
ख़ून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्क़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।

महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल अक्सर ये जो ग़ज़ल गाया करते थे, वो आज भी हर हिदुस्तानी के रगों में तूफान पैदा कर देता है। इस ग़ज़ल का हर शब्द अमर है और इस अमर नज्म के रचयिता हैं – शायरे सरफ़रोशी बिस्मिल अज़ीमाबादी।

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अक्सर लोग इसे राम प्रसाद बिस्मिल जी की रचना बताते हैं, लेकिन वास्तव में इन क्रांतिकारी पंक्तियों को अज़ीमाबाद (अब पटना) के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा है। इसे गाते हुए रामप्रसाद बिस्मिल हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए और खुद के साथ इस ग़ज़ल को भी अमर कर दिया । यह गज़ल इतनी प्रसिद्ध हुई कि काकोरी के इंकलाबियों के लिए आज़ादी का तराना बन गई। और तब से अब तक इंकलाबी बदलते रहे, पर पंक्तियाँ वही रहीं।

कुछ संदर्भ स्रोत हैं जिनसे यह साबित होता है कि “सरफ़रोशी की तमन्ना” रामप्रसाद बिस्मिल ने नहीं बल्कि बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखी थी।

* बिस्मिल अज़ीमाबादी ने यह नज्म 1921 में लिखी थी। जिस काग़ज़ पर यह नज़्म लिखी गई है, उस पर उनके उस्ताद शायर शाद अज़ीमाबादी ने सुधार भी किया है। इसकी मूल प्रति आज भी इनके परिवार के पास सुरक्षित है और इसकी नकल खुदाबख्श लाइब्रेरी में रखी हुई है।

* ‘बिस्मिल अज़ीमाबादी के नाम एक शाम’ रिकार्डिंग टेप-80 खुदाबख्श लाइब्रेरी में है। इसमें बिस्मिल अज़ीमाबादी का इंटरव्यू है जिसमें लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक आबिद रज़ा बेदार से इस बारे में उनकी बातचीत भी शामिल है। अपनी आवाज़ में ‘सरफऱोशी की तमन्ना’ को उन्होंने गाया भी है।

* ‘नेदा-ए-बिस्मिल’ में डॉ. शांति जैन ने लिखा है कि 1921 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह ग़ज़ल बिस्मिल अज़ीमाबादी ने पढ़ी थी।

* बिस्मिल अज़ीमाबादी का ग़ज़ल संग्रह ‘हिकायत-ए-हस्ती’ 1980 में छपा था, जिसमें ये ग़ज़ल शामिल है। बिहार उर्दू अकादमी के सहयोग से छपे इस संग्रह की कीमत बीस रुपये थी। यह संग्रह खुदाबख्श लाइब्रेरी में उपलब्ध है।

* बिहार सरकार के बीटीसी की नौवीं कक्षा की किताब ‘दरख्शां’ में लिखा गया है कि इस नज़्म की रचना बिस्मिल अज़ीमाबादी ने की थी।

* जेएनयू से बिस्मिल अज़ीमाबादी पर पीएचडी करने वाले मोहम्मद इकबाल द्वारा सम्पादित ‘कलाम-ए बिस्मिल’ में 11 मिसरे की यह ग़ज़ल छपी थी।

* राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान पर शोध कर चुके सुधीर विद्यार्थी कहते हैं, “सरफ़रोशी की तमन्ना को राम प्रसाद बिस्मिल ने गाया ज़रूर था, पर ये रचना बिस्मिल अज़ीमाबादी की है.”

* इतिहासकार प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ भी तस्दीक करते हैं कि यह ग़ज़ल बिस्मिल अज़ीमाबादी की ही है. प्रोफ़ेसर इम्तिाज़ के मुताबिक़, उनके एक दोस्त स्व. रिज़वान अहमद इस ग़ज़ल पर शोध कर चुके हैं, जिसे कई क़िस्तों में उन्होंने अपने अख़बार ‘अज़ीमाबाद एक्सप्रेस’ में प्रकाशित किया था.

इस अज़ीम फनकार का जन्म पटना ज़िले के खुसरूपूर के हरदास बीघा गाँव में हुआ था। इनके वालिद सय्यद शाह अल हसन हरदास बीघा के जमींदार थे। इनके जन्म को लेकर कई तरह की अफवाहें है, कोई उनकी पैदाइश 1900 ई बताता है तो कोई 1902 ई में। ये 2 वर्ष की उम्र तक हरदास बीघा में ही रहे, फिर इनके वालिद के इंतकाल के बाद इनका परिवार पटना चला आया और लोदीकटरा के इलाके में बस गया। इनका असली नाम सैयद शाह मोहम्मद हसन उर्फ़ शाह झब्बो था। अपना उपनाम इन्होनें बिस्मिल रखा। पटना(अज़ीमाबाद) के बाशिंदे थे, सो उर्दू की परम्परानुसार अज़ीमाबादी!
इन्हें साहित्य विरासत में मिली थी। इनके दादा और चाचा भी कवि थे, जो मशहूर वाहिद इलाहाबादी के छात्र थे।
इन्होनें ज्यादा शिक्षा नहीं ली थी। इन्हें अरबी और फ़ारसी का ज्ञान था।
इन्होनें शाद अज़ीमाबादी और उनके बाद मुबारक अज़ीमाबादी को उस्ताद माना।

बिस्मिल जमीन से जुड़े इंसान थे और खुसरुपुर के लोग इन्हें झब्बू भाई के नाम से जानते थे।
ये अजीमाबाद (पटना) के बड़े ही मशहूर शायर थे। इन्हें अज़ीमबाद के सभी मुशायरों में अग्र स्थान मिलता था। बिस्मिल आज़ादी के परवानों में थे और मुल्क के लिए इनकी आवाज़ ग़ज़लों से निकलती थी।

बिस्मिल अज़ीमाबादी के घर पे PatnaBeats कि मुलाक़ात बिस्मिल अज़ीमाबादी के पोते सय्यद अफसर हुसैन से हुई।

उन्होंने बताया कि उनके दादा ने इस इंकलाबी गज़ल को 1921 में लिखा था।
और वो आगे बताते हैं कि ये ग़ज़ल आज़ादी की लड़ाई के वक़्त काज़ी अब्दुल गफ़्फ़ार की पत्रिका ‘सबाह’ में 1922 में छपी, तो अंग्रेज़ी हुकूमत तिलमिला गई.
संपादक ने ख़त लिखकर बताया कि ब्रिटिश हुक़ूमत ने प्रकाशन को ज़ब्त कर लिया है.
इस ग़ज़ल का देश की आज़ादी की लड़ाई में एक अहम योगदान रहा है.

दरअसल यहां शायरों की महफि़ल जमती थी, जिसमें जमील मज़हरी, डॉ. मुबारक अज़ीमाबादी, जोश, ज़ार, सबा हुसैन रिज़वी, शाद अज़ीमाबादी आदि के शेर गूंजते थे। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ नज़्म जिन जगहों पर छपी उसे अंग्रेज सरकार ने ज़ब्त तो किया ही, उनके दादा की गिरफ्तारी का वारंट भी निकाल दिया। हुसैन ने बताया, “जब दादा ने यह नज़्म लिखी थी तो उनकी उम्र महज बीस साल की थी।”

1947 को भारत स्वतंत्र था, लेकिन देश में चारों ओर सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। भारत हिंसा की आग में घिरा हुआ था। इस घटना ने बिस्मिल को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। उनकी सभी गतिविधियाँ कम होती गयीं। जब तक उनके स्वास्थ्य ने अनुमति दी, लोगों से मिलते रहे, साहित्यिक बैठकों में लोकप्रिय निमंत्रित बने रहे ।

अब मुलाक़ात कहां शीशा ओ पैमाने से
फ़ातेहा पढ़ कर चले आते है मैख़ाने से
ग़ैर काहे सुनेगा तेरा दुखड़ा “बिस्मिल”
किसी को फ़ुर्सत है यहाँ अपनी ग़ज़ल गाने से

– बिस्मिल अज़ीमाबादी की किताब “हिकायत-ए-हस्ती” से ।

फिर बड़ी बेटी के आकस्मिक निधन और पत्नी की बीमारी ने उन्हें पुरी तरह तोड़ दिया। 1976 में, बिस्मिल लकवा से ग्रसित हो गए। उन्होंने दो साल तक ज़िंदगी से जद्दोजहद की। उनकी मानसिक हालत भी बहुत ख़राब हो चुकी थी। 20 जून 1978 को ‘अपने गीतों से दूसरों को जगाने वाला‘ खुद चिरनिद्रा में सो गया। उनकी इच्छानुसार उन्हें अपनी माँ के बगल में, गांव कुर्था में दफनाया गया।

बिस्मिल अज़ीमाबादी एक गुमनाम शायर की तरह रहे। इनके जाने के काफी बाद, इनके लिए पहल की गयी। इनकी किताब हिकायत-ए-हस्ती भी बहुत बाद (1980) में प्रकाशित हो सकी। अली सरदार जाफरी जैसे लोगों ने इन्हें प्रकाश में लाने के लिए सार्थक पहल की। बिस्मिल अज़ीमाबादी एक सच्चे शायर और देशभक्त थे, जिन्होनें मन से देश के लिए सोचा और दिल शायरी को दिया। जब-जब रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अमर शहीदों का जिक्र होगा, तब-तब ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ की अमर पंक्तियों को लिखने वाले ‘शायरे सरफ़रोशी’ बिस्मिल अज़ीमाबादी का भी जिक्र होगा।

बिस्मिल अज़ीमाबादी की लिखी असल ग़ज़ल :

 

बिस्मिल अज़ीमाबादी

1947 को भारत स्वतंत्र था, लेकिन देश में चारों ओर सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। भारत हिंसा की आग में घिरा हुआ था। इस घटना ने बिस्मिल को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।

बिस्मिल अज़ीमाबादी के ग़ज़लों के कुछ शेर, जिन्हें उन्होंने मुल्क के बंटवारे के समय लिखा था

“बयाबान-ए-जनों में शाम-ए-ग़रबत जब सताया की
मुझे रह रह कर ऐ सुबह वतन तू याद आया की”

“आज़ादी ने बाज़ू भी सलामत नहीं रखे
ऐ ताक़त-ए-परवाज़ तुझे लाए कहां से”

“कहां क़रार है कहने को दिल क़रार में है
जो थी ख़िज़ां में वही कैफ़ियत बहार में है”

“चमन को लग गई किसकी नज़र खुदा जाने
चमन रहा न रहे वो चमन के अफ़साने”

“पूछा भी है कभी आप ने कुछ हाल हमारा
देखा भी है कभी आके मुहब्बत की नज़र से”

“किस हाल में हो, कैसे हो, क्या करते हो बिस्मिल
मरते हो कि जीते हो ज़माने के असर से…”

“कहां तमाम हुई दास्तान बिस्मिल की
बहुत सी बात तो कहने को रह गई ऐ दोस्त”

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