“रेखना मेरी जान” के रत्नेश्वर कुमार सिंह से एक ख़ास बातचीत

हाल ही में अपनी किताब रेखना मेरी जान के लिए  पौने दो करोड़ का करार साइन करने वाले रत्नेश्वर जी पटना के निवासी हैं | रेखना मेरी जान उनकी उन्नीसवीं किताब है. नेशनल बुक ट्रस्ट से मीडिया पर एक किताब मीडिया लाइव छपी है, जीत का जादू और फिर उसकी अंग्रेजी में आई किताब मैजिक इन यू क्रमशः 16वीं और सतरहवीं किताब है। इस किताब को लिखने के पीछे उनका मक्सद युवाओं को साहित्य की ओर आकर्षित करना था. उनकी ये किताब बेस्टसेलर रही थी. उनके दो कहानी संग्रह भी छ्प चुके हैं जिनके नाम हैं “लेफ्टिनेंट हडसन” और “सिम्मड़ सफ़ेद”. एलेक्टोनिक मीडिया पर नेशनल बुक ट्रस्ट से उनकी कई किताबें हैं. जब हमने उनसे बात की तो उन्होंने कहा वो अपनी ज़िन्दगी के बारे में बात न करके सिर्फ अपनी किताब पर बात करेंगे चूँकि अपनी किताब में जो ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा उन्होंने उठाया है उसपर बात करने की ज्यादा जरुरत है . पेश है  बातचीत के कुछ अंश:

1.  रेखना मेरी जान बहुत आकर्षित करने वाला शीर्षक है, कौन है ये रेखना ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह –  ‘मैं तुमसे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ। क्या कहूं? … मुहब्बत करने के सिवा मुझे कुछ आता ही नहीं। कंटीली झाड़ियों और पथरीली जमीन पर मेरे पांव खुद-ब-खुद बढ़ रहे हैं तुम्हारी और।’ हाहाहा ! रेखना एक ऐसी प्रेमिका है, जो चाहे-अनचाहे हमारे दिलों में बसती है।


2. ये अब भी साफ़ नहीं हुआ की रेखना कौन है ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – बताया न ! रेखना वो है जिससे मैं जाने-अनजाने मुहब्बत करता हूँ।


3. “रेखना मेरी जान” का आइडिया आपको कहाँ से आया ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – पिछले 12 – 13 वर्षों से मौसम का मिज़ाज बदल रहा है। घाघ की सैकड़ों – सैकड़ों वर्षों के प्रामाणिक मौसमी आकलन, जो सच हुआ करते थे, गड़बड़ाने लगा था।  अख़बारों में ये ख़बर बनने लगी कि पृथ्वी पर गर्मी बढ़ रही है। अंटार्कटिका और हिमालय पिघल कर सिकुड़ रहा है। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और कई देश उसमें डूबने वाले हैं। तो ये आइडिया आया।


4.   ये घाघ का उदाहरण क्या है?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – हाहाहा ! घाघ भारत के ग्रामीण जीवन से जुड़ा कहावतें कहने वाला एक लोकप्रिय कवि था। “जब पुरबा पुरबइया बहे, सूखल नदी में नाव चले।” मतलब भारतीय कैलेण्डर के अनुसार यदि पुरबा नक्षत्र में पुरबाई हवा चलती है तो इतनी बारिश होती है की सूखी नदी में नाव चलने लगती है। यह सर्वथा सच होता था।


5. ग्लोबल वार्मिंग आपकी किताब के केंद्र में है। शायद इसके बहाने आपने कुछ भविष्यवाणी की है?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – अरे नहीं भाई ! मैं भविष्य वक्ता नहीं हूँ। जहाँ न पहुंचे रवि , वहां पहुंचे कवी। मैंने तो वैज्ञानिक तथ्यों का अध्यन किया।  वैज्ञानिकों का क्या आकलन है ग्लोबल वार्मिंग और उसके प्रभाव के बारे में! धरती और तपेगी तो क्या होगा ?मनुष्य, अन्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की क्या स्थिति रहेगी ?


6. मतलब यह पर्यावरण पर वैज्ञानिक किताब है?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – नहीं ! यह प्योर फिक्शन है। … पर हमारा कथानक वैज्ञानिक आधार पर केंद्रित है और उनके तथ्यों को एक कहानी में पिरो कर देखने की कोशिश की है।


7. पाठक की रूचि हिन्दी साहित्य में नहीं रही! फिर आप भारत के सबसे महंगे लेखक कैसे बन पाए ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – क्या आपकी रूचि नहीं है किताब पढ़ने में ?


8. हाँ है ! पर समय का थोड़ा अभाव रहता है ! फिर भी मेरी रूचि पढ़ने में है इसलिए समय निकाल ही लेती हूँ।

रत्नेश्वर कुमार सिंह – हाहाहा ! बस यही तो मैं कहना चाहता हूँ।  जो थोड़ी रूचि कम हुई है उसको वापस लाना है। दादी – नानी पहले कहानियां सुनाया करती थीं। उस परंपरा में कमी आई है। बचपन से जो कहानी सुनने-पढ़ने की ललक बन जाती थी उसका ह्रास हुआ। पर कहानी हमेशा सभी को आकर्षित करती है। बस उसे हौले – हौले सहलाने की जरूरत है। किताब उनतक पहुंचे तो लोग खरीदेंगे भी और पढ़ेंगे भी। देश भर के पुस्तक मेलों की पॉपुलारिटी इस बात के प्रमाण हैं।


9. आप हिंदी में भारत के सबसे महंगे लेखक हैं। आपको कैसा लग रहा है?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – भाई मैं तो ये मानता हूँ कि सबसे धनी लेखक वो है जिसके पास सबसे अधिक पाठक हैं। आज भी दिनकर की कविताएं जन – जन की जुबान पर हैं। … फिर उनसे बड़ा या धनी कोई नहीं ! अपने पाठकों के बीच लोकप्रियता से बनता है कोई बड़ा लेखक।


10. लोग ज्यादा क्या पढ़ना पसंद करते हैं ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – बड़ी अच्छी बात पूछी आपने ! हिंदी लेखकों और पाठकों में आजकल थोड़ी दूरी आ गयी है। लेखक अपना राग अलाप रहे हैं और पाठक फेसबुक – व्हाट्सएप्प की धुन पर नाच रहे हैं। मुझे लगता है कि आज भी पाठक प्रेम – कथा और करिश्माई हीरो की कहानियों को ज्यादा पढ़ना पसंद करता है।


11. शिक्षा प्रणाली को आप किस रूप में देखते हैं ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – मैं भारतीय शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव के पक्ष में हूँ ! अभी जिसकी याद करने या याद रखने की क्षमता ज्यादा है वही टॉपर बनता है। … पर यह जरूरी नहीं की वह क्रिएटिव भी हो!  क्रिएटिविटी और यादास्त दोनों को बराबर अंक दूंगा। विस्तार से कभी और बात होगी।


12. देश भर में आपकी “रेखना मेरी जान” किताब की धूम है। युवाओं के लिए कुछ कहना चाहेंगे ?

रत्नेश्वर कुमार सिंह – कहना तो बुजुर्गों से है कि वक्त रहते संभल जाएं। अन्यथा आनेवाली पीढ़ियां उनसे मुहब्बत के लिए नफरत और इस ताप्ती धरती केलिए माफ़ नहीं करेंगी। युवाओं से कुछ कहने की जरूरत नहीं। उनके पास मुझसे ज्यादा ताजगी है।  वे खुद अपना रास्ता समय के हिसाब से ढूढ़ लेंगे।

आप रेखना मेरी जान को ऑनलाइन यहाँ से बुक कर सकते हैं


रत्नेश्वर जी का मानना है की हम अपने बच्चों के भविष्य के बारे में तो सोचते हैं पर उनकी आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचना भूल जाते हैं और प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने लगते हैं.ग्लोबल वार्मिंग के बारे में अगर हमने अभी नहीं सोचा तो हमारी आपने वाली पीढ़ियों के लिए जल और अन्य संसाधनों की कमी लिए हमे ही जिम्मेवार ठहराया जाएगा. हम अगर प्रकृति के संरक्षण की परंपरा प्रारंभ कर दे तो हमारा तत्कालीन युवा इस परंपरा को आगे तो ले जाएगा ही साथ में धरती को भी नष्ट होने से बचा सकेंगे. उनका कहना है की सातवी शताब्दी में मदिरों की उत्पत्ति हुई वरना उस से पहले प्रकृति की पूजा की जाती थी जैसे सूर्य, वृक्ष ,जल, अग्नि क्यूंकि ये सभी हमारे जीवन को संरक्षित करते थे. अब वक्त आ गया है की हम फिर से प्रकृति की पूजा करें ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को संरक्षित कर सकें.

हम रत्नेश्वर जी को अपनी पुस्तक के लिए बहुत सारी शुभकामनाएं देते हैं और आशा करते हैं की “रेखना मेरी जान” सफलता के सारे रिकार्डों को ध्वस्त कर दे. साथ साथ हम ये भी कामना करते हैं की उनकी किताब को पढ़ कर हर कोई ग्लोबल वार्मिंग को लेकर सजग हो जाए.

आप रेखना मेरी जान की कुछ कथा पाठ नीचे देख सकते हैं

Do you like the article? Or have an interesting story to share? Please write to us at [email protected], or connect with us on Facebook and Twitter.


Quote of the day:““When you make a choice, you change the future.” 
― Deepak Chopra

Comments

comments