आई आई टी _ भाई के कंधों पर सवार होकर चढ़ेगा आईआईटी की सीढ़ी

भाई के कंधों पर सवार होकर चढ़ेगा आई आई टी की सीढ़ी |

बिहार के समस्तीपुर के निकट परोरिया गांव निवासी छात्र बसंत कुमार की खुशी का इन दिनों ठिकाना नहीं है। खुशी का एक कारण जेईई एडवांस की काउंसलिंग में शामिल होना तो है ही लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि उसके सहयोग से बड़ा भाई दिव्यांग कृष्ण कुमार भी आईआईटी से इंजीनियरिंग कर सकेगा। कृष्ण का भी एडवांस में चयन हुआ है और ओबीसी पीडब्ल्यूडी कोटे में अखिल भारतीय स्तर पर 38वां स्थान प्राप्त किया है। वहीं बसंत कुमार को ओबीसी में 3675 रैंक मिली है। दोनों पिछले 15 वर्षों से एक-एक पल साथ बिताते रहे हैं। थोड़ा दुःख यह है कि एक दूसरे से जुदा हो जाएंआई आई टी _ भाई के कंधों पर सवार होकर चढ़ेगा आईआईटी की सीढ़ीगे।


यह कहानी है बिहार के समस्तीपुर जिले के परोरिया की, जो करीब 400 परिवारों का गांव है। गांव के किसान मदन पंडित करीब 5 बीघा जमीन की खेती पर आश्रित हैं। पुत्र कृष्ण कुमार को डेढ़ साल की उम्र में पोलियो हो गया। दोनों पैर खराब हो गए। दांए हाथ पर भी कुछ असर है। दो साल तक स्कूल नहीं जा सका। इसके बाद छोटा भाई बसंत कुमार बड़ा हुआ और उसके स्कूल जाने की उम्र हुई तो दोनों को एक साथ गांव के प्राथमिक विद्यालय में दाखिला दिलवा दिया। धीरे-धीरे बसंत अपने साथ कृष्ण को ले जाने लगा। बचपन से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है। कोटा में तीन साल कोचिंग करने के बाद इस वर्ष दोनों ने जेईई-एडवांस की परीक्षा और सफलता प्राप्त की।

 

नहीं रह सकते अलग

 

रिजल्ट के बाद कृष्ण ने बताया कि हम दोनों बचपन से साथ रह रहे हैं। बसंत मेरे लिए हर काम करता है। मुझे कंधे पर बिठाकर क्लास में ले जाता है। घर से लाता है। खाना लगाता है। इसके बिना कैसे रह सकूंगा। बसंत ने कहा कि मुझे यह सब करने की इतनी आदत हो चुकी है, भाई के लिए कुछ भी करता हूं तो बहुत खुशी होती है। मैं भी कृष्ण के बिना नहीं रह सकता। पिछले दिनों ही गांव से आते समय इसी दुःख के चलते दो दिन तक ठीक से खाना नहीं खा सका।

शिविर में रहे थे साथ

 

बसंत ने बताया कि जब हम पांचवी में थे तो गांव के निकट हसनपुर के सकरपुरा में दिव्यांगों के लिए आवासीय शिविर लगाया गया। कृष्ण भी वहां गया। एक दिन ही रहा, दूसरे दिन टीचर मुझे बुलाने आए, कृष्ण मेरे बिना नहीं रह रहा था। हम दोनों को साथ रहने की इजाजत दी गई।

संघर्ष बचपन से

गांव में आठवीं तक ही स्कूल था। दोनों ने वहां साथ पढ़ाई की। इसके बाद 10 किमी दूर रोसरा में प्रवेश लिया, साइकिल से जाते-आते थे। तब भी दोनों साथ रहते थे। इसके बाद जब कोटा आने की बात हुई तो गांव वालों ने कहा इसे कहां ले जाएगा, ये कैसे जाएगा लेकिन मैं नहीं माना और हम दोनों कोटा आ गए। बड़े भाई यहां आकर हमें किराये के मकान में रखकर गए।

साथ पढ़ना चाहते हैं

बसंत और कृष्ण अब आगे भी साथ पढ़ना चाहते हैं। दोनों का मानना है कि भले किसी भी काॅलेज में प्रवेश मिले लेकिन एक ही क्लास में पढ़ें। बसंत का कहना है कि इंजीनियरिंग के बाद प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहता है, वहीं कृष्ण कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करना चाहता है।

गैराज में काम करके भाई उठा रहे खर्च

मदन पंडित के छह पुत्र हैं। दो बड़े पुत्र श्रवण व राजेश मुम्बई में गैराज में काम करते हैं। फीस में बड़ी रियायत तो एलन ने दे दी, इसके बाद शेष खर्च दोनों भाई उठा रहे हैं। तीसरा पुत्र राजीव इंजीनियरिंग कर रहा है। चैथा कृष्ण और पांचवा बसंत है। इनसे छोटा प्रियतम 10वीं में है। श्रवण और राजेश की जिद है कि कृष्ण और बसंत को इंजीनियर बनाना है। गांव वालों के मना करने के बाद भी दोनों भाइयों ने खर्च उठाया और कोटा में पढ़ने भेजा। इनका कहना है कि पांव तो नहीं लेकिन कृष्ण अपनी प्रतिभा के दम पर खड़ा होकर दिखाएगा।

Don’t Want to miss anything from us

Get Weekly updates on the latest Beats from
Bihar right in your mail.

BEAT BY

PatnaBeats Staff

Born in Bihar, brought up in India!