Ek Kavita Bihar Se

नारी की स्थिति को दर्शाती , शेफालिका वर्मा की एक कविता बिहार से

शेफालिका वर्मा मैथिली की प्रतिष्ठित लेखिका हैं, जिन्होंने पद्य एवं गद्य की विभिन्न विधाओं में समान रूप से अपनी लेखनी चलाई है। वे हिंदी एवं अंग्रेजी में भी लिखती हैं। एक लेखिका एवं साहित्यकार के रूप में शेफालिका जी ने जो सम्मान एवं सराहना अर्जित की है, वह काफी सराहनीय है। शेफालिका जी को मैथिली संसार में मैथिली की महादेवी कहकर संबोधित किया जाता है। ग़ौरतलब है कि भागलपुर में जन्मीं शेफालिका की शादी 15 साल की उम्र में सहरसा में हुई और शादी के बाद उन्होंने मैथिली में लिखना शुरू किया। शेफालिका वर्मा को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिये मिथिला रत्न सम्मान, स्वजन सम्मान, अटल मिथिला सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कार-सम्मान प्रदान किये गए हैं। 
प्रस्तुत कविता ‘ नारी ‘ में शेफालिका वर्मा ने नारी की पहचान, नारी के बलिदान और आज के समय में उनको दी गयी परिभाषा को व्यक्त किया है। पेश है “एक कविता बिहार से” में नारी की स्थिति को दर्शाती शेफालिका वर्मा की कविता:
Ek Kavita Bihar Se
मैं नारी हूँ, ये अपराध मेरा तो नहीं
हाँ मैं  नारी हूँ !
तुम्हारी लेखनी ने संस्कृति के उत्कर्ष तक  
मुझे पहुंचा दिया 
धरती का प्राणी ही नहीं 
देवी भी मुझे बना दिया
मैं नारी हूँ, ये अपराध मेरा तो नहीं
हाँ मैं नारी हूँ !
किन्तु,
तुमने मुझे बना दिया 
पाताल की छाती को विदीर्ण करनेवाली 
एक चीत्कार  
प्रकृति-पटी पर उमड़ती कोसी का 
हाहाकार
अधरों पर आता है कभी शरद-प्रात 
कभी पूस की सर्द रात 
दर्पण में जब भी अपना चेहरा देखती हूँ 
सीता की व्यथित परछाही 
पलकों की कोर पर थरथरा  जाती है..
मेरा आँचल चाँद तारों से नहीं
राहू केतु  से भर जाता है 
किन्तु नहीं अब नहीं….
हवा छू देने से नारी मैली नहीं होगी
नारी समझ गयी हाड मांस से बने इस 
देह में कुछ भी नहीं 
जिससे तुम बने, वह बनी
प्रकृति सुकूमार बनी है..
फिर दोषी मै ही क्यों ?
यहाँ कुम्हड़ बतिया नहीं कोई 
तर्जनी देख मुरझाने वाली अब हम नहीं  
अब जमाना बदल गया 
देश की आज़ादी नारी के अंतर में उतर गयी 
एक तीव्र धूप नारी के अंतर में फ़ैल गयी
घर बाहर को जगमगाती 
आकाश छूने की परिकल्पना से 
नव निर्माण के विस्तार में 
नवल सूर्योदय भरती 
परम्परा-अपरम्परा को ध्वस्त करती  नारी 
आज आगे बढ़ रही  है……..
फिर भी उसका समर्पण देखो 
सब कुछ सहती 
जन्म तुम्ही को देती है 
सृजन मैं करती हूँ ……
विधाता तुम बन जाते हो 
पुरुष विमर्श छोड़, नारी विमर्श की बात करते हो……
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Puja Kaushik

Aspiring Writer by passion. I express my life experience along with my observation of the world.