प्रवासी बिहारियों के दिल की पुकार : माँ, माटी और माइग्रेशन

हाल के दिनों में बिहारी भाषाओँ, ख़ास तौर पर भोजपुरी में साफ़ सुथरे और अच्छे स्तर के गानों एवं शॉर्ट फिल्मों की नयी खेप आने लगी है। इन सारे कंटेंट को इंटरनेट और सोशल मीडिया एक बड़ा और सर्वव्यापी प्लेटफार्म प्रदान कर रहा है। इसी खेप में एक नया नाम जुड़ गया है “माँ, माटी और माइग्रेशन” का।


नौकरी या पढ़ाई हम बिहारियों को बिहार से बाहर जाने पे मजबूर कर देती है। कईयों को लगता है कि बिहार से बाहर जा के महानगरों की भीड़ भाड़ और तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में हमारे अंदर का बिहारी खो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। हर प्रवासी बिहारी के दिल के एक कोने में बिहार बसता है। वो सारी बचपन की बातें, घर का खाना, परिवार का साथ..ये सब की यादें राज्य से बाहर रह रहे बिहारियों को सताती है। उन्ही यादों को एक ख़ूबसूरत गाने और म्यूजिक वीडियो की शक्ल में आपके सामने ले आया है “माँ, माटी और माइग्रेशन” ।


गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और मसान जैसी बेहतरीन फ़िल्मों के जरिये बिहार का नाम ऊँचा करने वाले सत्यकाम आनंद हमेशा से भोजपुरी को उसकी गरिमा वापस दिलाने की बात करते रहे हैं। “माँ, माटी और माइग्रेशन” के जरिये ये उनका एक सराहनीय प्रयास है। भोजपुरी संगीत की पारंपरिक गरिमा और मिठास को बनाये रखते हुए ये गाना अभी के अंदाज़ में पेश किया गया है। देवेंद्र सिंह के लिखे गाने को आशीष मोहंती के संगीत में आवाज़ दी है शाहान अली ने। भोजपुरी संगीत की जो अश्लीलता और फूहड़पन वाली छवि बनी हुई है उस छवि को तोड़ने की एक सराहनीय कोशिश है ये गाना।

माइग्रेशन या पलायन बिहार के लिये एक अभिशाप है। दुनिया का कोई इंसान अपने घर, अपने परिवार, अपनी माटी से दूर नहीं होना चाहता है। लेकिन ये दुर्भाग्य है कि कई बिहारियों को घर का सुख त्यागना पड़ता है अपने बेहतर भविष्य के लिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अवसरों और सम्पदाओं की कमी है  हमारे प्रदेश में। यही वजह रही है कि अवसर की तलाश बिहारियों को परदेस ले जाती है। लेकिन इस गाने के जरिये ये बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया गया है कि सैकड़ो-हज़ारो किलोमीटर की दूरी भी एक बिहारी के दिल से उसके बिहार को, उसकी माँ के आँचल को और उसकी माटी की खुशबु को दूर नहीं कर सकती है। महानगरों की भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी जीते चाहे कितना ही वक़्त गुज़र जाए लेकिन गाँव-देहात में बिताया बचपन भुलाया नहीं जा सकता और दिल में हमेशा से एक कसक रहेगी उस ज़िन्दगी से दूर होने की मजबूरी की वजह से। अपने अतीत की यादों और अपने आज के हकीकत के बीच इंसान दो टुकड़ों में बंटा हुआ जीवन जीता है।  ‘माँ, माटी और माइग्रेशन’ के जरिये एक प्रवासी बिहारी के अधूरेपन को खूबसूरती से दिखाया गया है। हर प्रवासी बिहारी को ये गाना अपने दिल की आवाज़ जैसा लगेगा।

 


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Quote of the day: “From a small seed a mighty trunk may grow.”

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