Maa

माँ और बेटी की अलग धारणा के बीच छुपे प्यार को दर्शाती एक कविता बिहार से

भागलपुर की ऐश्वर्य राज दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा है। मिरांडा हाउस से दर्शनशास्त्र में स्नातक कर रहीं है। अपनी कविताओं से पितृसत्ता समाज की रूढ़िवादी सोच पर सवाल करतीं है। उनका मानना है ,जीवन और साहित्य को बांधकर शब्दों में डालना बेईमानी है। कविताओं के माध्यम से आज के समाज में युवा अपने कलम को हथियार बना रहे है, वैसी ही क्रांतिकारी रचनाएँ ऐश्वर्य राज ने भी पेश की है ।इनकी कविताओं में प्रेम का भाव, सोच पर कटाक्ष के साथ – साथ बैरागपन भी नज़र आता है। समाज में स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई हो या सच्चाई से बोध कराना, उनके शब्दों का चुनाव बहुत ही अद्भुत है।

मातृ दिवस पर माँ को बधाई देना, उनके प्रति प्यार दिखाना आज आम बात है। एक कविता के माध्यम से माँ को परिभाषित कर ऐश्वर्य राज ने ममता, एक माँ का बेटी के प्रति समर्पण और समाज के मेल को दर्शाया है। माँ और बेटी की अलग धारणा मगर उन सब के बीच छुपे प्यार का समागम है ऐश्वर्य राज की कविता ‘मेरी माँ ‘ .

तो ‘एक कविता बिहार से‘ में आज हम पेश कर रहे हैं, ऐश्वर्य राज की कविता ‘ मेरी माँ ‘-

Maa

[divider]Also read – ‘एक कविता बिहार से’ में आज प्रस्तुत है एक गृहणी की कविता[/divider]

छोटे शहरों की माँ नहीं जान पाती है नारीवाद
और वो लड़ती है अपने बेटियों के महवाकांक्षाओं के लिए,
उसका सारा समय बित जाता है
जूठे बर्तनों को चमकाते, सब्जी लाने वाले झोले के छेदों को सिलते हुए
फुर्सत के क्षणों में वो गिनती है अपनी पुरानी साड़ियां, बचाये हुए सिक्के, मेरे बचपन की तश्वीरें..
उसे नहीं समझ आता ‘मेकअप’
उसे लगता है काजल और क्रीम न खरीद कर
वो बचा रही है पैसे दूर पढ़ने गए अपने बच्चे के लिए।

अलमारी साफ करते वक़्त
एक बार माँ को मिली थी मेरी एक अंग्रेज़ी किताब
उस दिन बड़ी हिम्मत की उसने
टो-टो कर, उल्टे-सीधे उच्चारण करते, हिज्जे लगाकर कुछ तो बुदबुदाने लगी थी
तभी कमरे में गूंज उठी पापा के ठहाके की आवाज़
और किचन में प्रेशर कुकर की सीटी…

माँ ने किताब रखते वक़्त जिल्द पर लिखे मेरे नाम को कई बार देखा
और अकेले में बहुत देर तक मुस्कुराई थी
उसे हर बात में संतोष करने की आदत है,
इस बार उसने यह सोचकर संतोष किया होगा कि मेरी जिंदगी इससे अलग होगी….

मैं अपने माँ जैसी नहीं हूँ
मैं अपना कमरा साफ़ नहीं रख पाती,
बालों में तेल लगाना भी मुझे नहीं पसंद,
मैं तरकारी ज्यादा तीखी बनाती हूँ,
मुझे नहीं आती आधे पेट खाकर संतोष की नींद,
और
मैं ज़्यादा सवाल करती हूँ, अपनेआप से, औरों से
क्योंकि मैंने पढ़े हैं माँ के मन के सारे अनकहे सवाल,
क्योंकि मैंने देखा है संतोष और समझौते को एक होते
माँ के ‘फर्स्ट डिवीज़न’ की मार्कशीटों में
आधी खाली पड़ी कविता वाली एक डायरी में..

मैं हमेशा से नाकामयाब हूँ उसे उसका स्नेह लौटा पाने में
माँ को किसी कविता में कैद कर पाना बेमानी है,
ऐसी कोशिश, मेरी खुदगर्ज़ी

काश! तुम भी अपने लिए थोड़ी खुदगर्ज़ हो पाती, माँ..


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Puja Kaushik

Aspiring Writer by passion. I express my life experience along with my observation of the world.