चंद्रशेखर तुम होते तो हम साथ-साथ उम्र जी लेते | एक कविता बिहार से

डर लगता है जब कोई दिवार लांघने की कोशिश करता है| डर लगता है जब कोई सच कहने की कोशिश करता है| डर लगता है जब किसी के विचार एक बाहुबली से टकराते हैं| डर लगता है जब कोई चंदू बनने की राह पर होता है| कन्हैया और रोहित से पहले एक नाम चंदू का था, जिसके लिए छात्र एकजुट हो जाया करते थे| किसी की तुलना जायज नहीं| रोहित अपनी जिन्दगी से हार गये, जबकि चंदू की जिन्दगी कोई जीत ले गया| चंदू बाहुबली नेताओं को सामने से ललकारने वाले युवा योद्धा थे| कन्हैया के आन्दोलन में भी चंदू का नाम लिया जाता रहा| चंदू छात्र आंदोलनों के पर्याय बन चुके हैं| वही चंदू जिनके समर्थन में हजारों की भीड़ रहती थी| वही चंदू जिनके गुनाहगारों को सजा दिलवाने के लिए देश भर के युवा सड़क पर आ गये थे| चंदू, इस देश की बिखरती राजनीति को समेटने की उम्मीद थे| उसी चंदू का आज जन्मदिन है| लेकिन कौन है ये चंदू?

चंदू से जब उनका परिचय पूछा जाये तो जवाब कुछ ऐसा था- “मेरा नाम चंद्रशेखर है और मैं यहाँ पीएचडी का स्टूडेंट हूँ| मैं बिहार का रहने वाला हूँ, हिंदी प्रदेश का| मेरा पीएचडी का विषय है भारतीय नव जागरण की समस्याएँ, हिंदी प्रदेश में| मेरा लम्बे समय से वामपंथी छात्र आन्दोलन से वास्ता रहा है|”

20 सितम्बर 1964 को बिहार के सिवान में जन्मे चंद्रशेखर प्रसाद को लोग चंदू के नाम से जानते हैं| इनके पिता का नाम जीवन सिंह और माँ का नाम कौशल्या देवी है| आठ साल की उम्र में पिताजी का देहांत हो गया| शुरुआती शिक्षा गाँव में ही ली, बाद में तिलैया  के सैनिक स्कूल से आगे की पढ़ाई की।| चंदू को देश की सेवा करनी थी| उन्होंने इंडियन नेशनल डिफेंस एकेडमी भी ज्वाइन किया| लेकिन वहाँ उन्हें एहसास हुआ, देश की सेवा के लिए उन्हें राजनीति का रास्ता अख्तियार करना चाहिए| वो लौट आये| पटना विश्वविद्यालय के छात्र बने| छात्र ही नहीं, छात्र नेता बने| आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के बिहार यूनिट के वो उपाध्यक्ष थे|
1993-94 में JNU से जुड़ने के बाद, राजनीति और जन सेवा में गहरी रुचि रखने वाले चंदू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा| उनकी विचारधारा के लोग कायल बनते गये| आइसा से जुड़ने के बाद वो लगातार छात्रों की समस्याओं के लिए लड़ते रहे| कई बार अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी को पीछे रख कर अन्य छात्र के हित में कदम उठाये| उनके मुद्दों में व्यापकता थी| सिर्फ छात्रों और विश्वविद्यालय ही नहीं, देश के अन्य हिस्से में चल रही लड़ाई में भी भागिदार बने| एक बार JNU छात्र संघ के उपाध्यक्ष बनने के बाद लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गये| भारत में ‘पूर्ण लोकतंत्र’ की स्थापना का उद्देश्य उन्हें आगे बढ़ाता गया|
यूनिवर्सिटी छोड़ के जनसमूह के बीच में काम करने के मकसद से अपने राज्य में वापस आये| उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा था| 3 अप्रेल 1997 को होने वाले भाकपा(माले) के बिहार बंद को सफल बनाने के लिए 31 मार्च को सिवान के जे.पी. चौक पर थे| उस नुक्कड़ सभा को संबोधित करने का मकसद जनता से इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अपील करना था|
तात्कालिक सरकार में शामिल शहाबुद्दीन को साफ़ तौर पर अपने लिए खतरा दिख रहा था| वो जानते थे इस बार मुद्दा उनके द्वारा फैलाये जा रहे हिंसा और भ्रष्टाचार का होगा| वो जानते थे कि ये शख्स उनकी जड़ों को उखाड़ के फेंक सकता था| शहाबुद्दीन के खौफ की वजह से जनता में कोई ऐसा नहीं था जो उसके खिलाफ आवाज उठा सके| उस नुक्कड़ सभा में और उसके बाद भी यही दुस्साहस चंदू करने वाले थे|
उसी सभा में चंदू और उनके एक साथी को गोलियों से भून दिया गया| शहाबुद्दीन के खिलाफ उठने वाली आवाज को हमेशा के लिए शांत कर दिया गया| इसके परिणाम स्वरुप पूरा JNU आंदोलित हो गया| दिल्ली में बिहार निवास के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय तक पर आन्दोलन हुआ| सीवान की सड़कों पर जन सैलाब उमड़ पड़ा| ये आन्दोलन चलता रहा| इसका नेतृत्व खुद चंदू की माँ ने किया| वो माँ कितनी मजबूत रही होगी जिसका बेटा पत्र में उसे लाल सलाम भेजता हो!
तात्कालिक सरकार ने गुनाहगारों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाये| शूटरों को गिरफ्तार किया गया, उम्र कैद की सज़ा भी हुई, लेकिन असल गुनाहगार को किसी तरह का नुक्सान नहीं होने दिया गया|

चंदू एक तेज-तर्रार, जज़्बे वाले और स्पष्ट विचारधारा के साथ चलने वाले ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो आज भी लोगों के ज़ेहन में है और प्रेरणा देता है| उनका एक ही मकसद था- “समाज से जो लिया है, हमें समाज को वो देना पड़ेगा|” चंदू आज भी छात्रों और छात्र नेताओं के आदर्श हैं|

अपनी एक सभा में चंदू ने कहा था- “हम अगर कहीं जायेंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी, जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं| और अगर व्यक्तिगत महत्वकांक्षा होगी तो भगत सिंह के जैसे शहीद होने की महत्वकांक्षा होगी, न कि JNU के इलेक्शन में गाँठ जोड़ जीतने या हारने की महत्वकांक्षा होगी|

उनकी शहादत उनके इन शब्दों को चरितार्थ करती है| उनको जानने वाले लोग कहते हैं, “चंदू के कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था|” अपने भाषणों में वो जिस आदर्श की बात करते थे, निजी जीवन में समाज के प्रति अपनी उसी जवाबदेही और जिम्मेदारी के साथ उतरते थे|
लोग इंकार नहीं करते कि अगर आज चंदू हमारे साथ होते तो एक बड़े जननेता के तौर पर देश की सेवा कर रहे होते| अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा में वो अक्सर कहा करते थे कि “हाँ मेरी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन और चे ग्वेरा की तरह मौत|

चंदू जैसे स्वछन्द मानसिकता के नेता बहुत कम होते हैं, जिनमें समाज अपनी बेहतरी की सम्भावनाएँ तलाशता हो| ऐसे जिंदादिल, प्रबुद्ध, मार्क्सवादी नेता के जन्मदिन का उत्सव मनाया जाना चाहिए|
पटनाबीट्स के एक कविता बिहार से में आज जो कविता शामिल हो रही है वो चंदू के लिए लिखी गयी है| उन्हीं की एक मित्र, निवेदिता शकील जी की लिखी हुई ये कविता चंदू और समाज के आत्मीयता को दिखाने के लिए पर्याप्त है| निवेदिता जी पेशे से पत्रकार हैं| सामाजिक आन्दोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं| नटमंडप में एक्टिंग कर चुकी हैं और फ़िलहाल एक कविता संग्रह की पुस्तक ‘ज़ख्म जितने थे’ के जरिये साहित्यिक संसार में भी कदम रख चुकी हैं|

 

मेरे प्यारे दोस्त के नाम ये कविता

चंद्रशेखर तुम होते तो
हम साथ-साथ उम्र जी लेते
भोर को उगते देखते
और रात लाल पंखो पर आती
तुम होते तो हम ५० के होते
तुम्हारी दाढ़ी की नीली छाँह पर सफ़ेद रंग
बादलों में डूबा चाँद सा दिखता
तुम हँसते
उम्र हँसती
मेरे दोस्त
रात गहरी है
यादें भी
यादों की लंबी छायाएं
मेरे भीतर उगती है
हम नहीं भूलना चाहते हत्यारे की आखें
हम नहीं भूलना चाहते ख़ून से भीगी मिट्टी
हम नहीं भूलना चाहते अग्निबीज
जो तुमने बोये थे
तुम सुन रहे हो ना चंद्रशेखर
शाखों से टपकती बूंद निर्झरणियां
बादलों की घड़कन
कामगारों के, किसानों के मुक्ति गीत
अभी भी शेष है बहुत कुछ
दुःख भी, सपने भी
इस भुरभुरी जमीन पर
फिर हम उगा लेंगे एक घास भरे मैदान|

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