खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी की ऐतिहासिक प्रासंगिकता

 

शक्ति और संस्कृति के अध्ययन के इतिहास की भूमि है बिहार, यहीं है खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी, ज्ञान और कला का अनमोल खजाना | पाटलिपुत्र और अजीमाबाद से लेकर पटना का सफर करने वाले शहर की तहजीब एवं विरासत का यह खूबसूरत नमूना गंगा नदी से 100 मीटर दूर पटना के अशोक राजपथ पर स्थित है। 

कहा जाता है कि ज्ञान वह चीज है जो बांटने से बढ़ती है इसलिए 1876 में मोहम्मद बख्श ने अपने बड़े बेटे मोहम्मद खुदा बख्श के हवाले करते हुए यह वसीयत कर दी कि इस  इल्म के खजाने को धर्म जाति या भाषा की पाबंदी से आजाद रखकर आम लोगों के लिए खोल दिया जाए |

लाइब्रेरी को 1891 में जनता के लिए खोला गया था। मोहम्मद बख्श ने अपने बेटे को 1400 पांडुलिपियों का संग्रह किया था। 

1400 पांडुलिपियों और दुर्लभ पुस्तकों के निजी संग्रह के रूप में जो शुरू हुआ वह अब फारसी, अरबी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, तुर्की और कई अन्य भाषाओं में 21,000 पांडुलिपियों और 250,000 मुद्रित पुस्तकों के साथ एक अविश्वसनीय पुस्तकालय है।

खुदा बख्श

इसे बढ़ाने के लिए खुदा बख्श ने एक व्यक्ति को नियुक्त कर उसे अरब देशों में पांडुलिपियों को संग्रहित करने के लिए भेजा था। 

पांडुलिपि संरक्षण केंद्र के रूप में, पुस्तकालय ने 8,468 पांडुलिपियों की देखभाल की है और 247 पांडुलिपियों का उपचारात्मक संरक्षण किया है, और उसे डिजिटाइज्ड कर ऑनलाइन उपलब्ध कराया।

यह लाइब्रेरी दुनिया भर के शोधकर्ताओं को खींचती है, एपीजे अब्दुल कलाम, छह वायसराय, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर और भारत के चार राष्ट्रपति यहां आ चुके है।

 वर्ष 1888 में खुदा बख्श ने 4000 पांडुलिपियों के लिए दो मंजिला इमारत का निर्माण करवा इसे आम जनता के लिए खोला।  यहां उर्दू साहित्य के अलावे अरबी और फारसी पांडुलिपियों, राजपूती कलाकृतियां, मुगल चित्रकारी और 25 मिमी चौड़ी कुरान की पांडुलिपियों का संग्रह है। इसके अतिरिक्त यह स्पेन कॉर्डोबा के मूरिश विश्वविद्यालय से पुस्तक, हस्तनिर्मित चित्रकारी भरी मुगल काल से संबंधित पुस्तकें और ताड़ के पत्तों पर  लिखी गई पांडुलिपियां हैं। इस पुस्तकालय में आज 21000 प्राचीन पांडुलिपियां और ढाई लाख से अधिक पुस्तकें हैं।

 वर्ष 1969 में खुदा बख्श की ओरिएंटल लाइब्रेरी को संसद के अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। अब यह पूरी तरह से भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित है और इसका प्रबंधन एक परिषद द्वारा किया जा रहा है।

 अपने पिता की मृत्यु के बाद खुदाबख्श ने  इस लाइब्रेरी की स्थापना पटना में की | शुरुआत में इसका नाम ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी था जिसका उद्घाटन बिहार बंगाल के गवर्नर सर चार्ल्स एलियट ने किया था बाद में इसका नाम बदल कर खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी रखा गया |

 1969 में पार्लियामेंट द्वारा खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी को नेशनल हेरिटेज के रूप में स्थापित किया गया था। इस एक्ट के तहत कई कमेटियां बनाई गई । गवर्निंग बॉडी की स्थापना की गई जिसके चेयरमैन का पदभार बिहार के गवर्नर को सौंपा गया था। बिहार के अकाउंटेंट जनरल को इसका सदस्य बनाया गया तथा एक डायरेक्टर के पद का निर्माण हुआ था। लाइब्रेरी के प्रथम डायरेक्टर के रूप में आबिद रजाबेदार ने 24 वर्षों तक इसकी सेवा की तथा लाइब्रेरी के आधुनिकीकरण में उनका योगदान था। 

उनकी एक बड़ी ही दिलचस्प आदत थी वह घूम घूम कर रीडर्स से बात करते थे तथा उनसे पूछते थे की उन्हें कौन सी किताबों की आवश्यकता है और जल्द से जल्द उन किताबों की व्यवस्था की जाती थी|

 खुदा बख्श नायाब और नादिर किताबों में दिलचस्पी लेते थे जिसके लिए उन्होंने एक अरबी मुलाजिम रखा था। वह दूसरे शहरों से खास और सबसे कीमती किताब  खुदा बख्श को लेकर देता था।  

इस पुस्तकालय में एक प्रिंटिंग प्रेस भी है जिससे यहां की एक त्रैमासिक पत्रिका छापी जाती है,अभी तक यहां से 500 से अधिक किताबें छापी जा चुकी हैं।

यहां प्राचीन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए एक संरक्षण प्रयोगशाला भी है जिसमे पाइजन प्रूफ प्लेट जो की बादशाहो द्वारा खाने में जहर पकड़ने के लिए किया जाता था ,चीनी बरतने, एटलस, एस्ट्रोनॉमिकल यन्त्र संग्रहित किए गए हैं| औरंगजेब द्वारा बेटे को हिंदी सिखाने के लिए बनवायी गयी प्रथम हिंदी डिक्शनरी,  पर्शियन पोएट्री का संग्रह खुशरो बसीरी, तुगलक काल के ऐतिहासिक सामाजिक एवं चिकित्सा खासकर यूनानी चिकित्सा पे सीरत ए फिरोजशाही की पांडुलिपि,  ईरान के इतिहास पर कविता , देवी देवताओं की कलाकृतियों से सजी पांडुलिपि , सर्जरी पर आश्रित अरेबिक पांडुलिपि , भागवत गीता एवं रामायण संग्रहित किया गया है।  

 मुगल स्कूल ऑफ आर्ट , राजपूत स्कूल ऑफ आर्ट एवं सेंट्रल एशियन स्कूल ऑफ आर्ट तथा तंजौर स्कूल ऑफ आर्ट से कम से कम 2,000 से अधिक चित्र इस लाइब्रेरी में मौजूद है |

शाहजहां की हैंडराइटिंग में लिखा गया एक दस्तावेज भी मौजूद है जिसमें उन्होंने अकबर के बारे में लिखा है की यह तिमुर नामा शाह बाबा के जमाने ने तैयार किया गया था |

 इसकी अपनी पब्लिकेशन का मुख्य उद्देश्य था अच्छी किताबों को आम लोगों तक पहुंचाना, जिसके लिए चुनिंदा किताबों को ट्रांसलेट किया जा रहा | रामधारी सिंह दिनकर की किताब संस्कृति के चार अध्याय को उर्दू में अनुवाद किया जा रहा।  शाद अजीमाबादी की किताब हिंदू धर्म बिहार में का हिंदी अनुवाद भी किया गया |

 खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी  पूरे विश्व के शोधकर्ताओं एवं इतिहासकारों के लिए एक गागर रूपी सागर की तरह है जिसमें ज्ञान और कला दोनों कूट-कूट कर मोतियों की तरह सजाए गए हैं |

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