हिन्दी की लड़कियां | रवीश कुमार द्वारा लिखित सीरीज़ की पहली लड़की बिहार से

रवीश कुमार द्वारा लिखित-

बहुत दिनों से मेरे दिमाग़ में एक बात कौंध जाती है. हिन्दी की लड़कियां. लड़कियां हिन्दी या अंग्रेज़ी की नहीं होती हैं. पर जो लड़कियां मेरे दिमाग़ में हैं, मैं उन्हें हिन्दी की ही कहना चाहता हूं. इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा. हिन्दी की लड़कियां इसी समय में हिन्दी के पब्लिक स्पेस को तरह तरह से रंग रही हैं. रंगने से पहले पुराने रंगों की पपड़ी उधेड़ रही हैं. मैं हिन्दी की लड़कियां नाम से एक सीरीज़ लिखने जा रहा हूं. मैं किसी अख़बार का संपादक होता तो पूरे पन्ने पर ये कवर स्टोरी करता और इन नायिकाओं के बाग़ी लेखन से पन्ने को भर देता. मुझे लगता है कि मैं इन सबको प्यार करता हूं. ये मेरी हिन्दी की थाती हैं. उसी कड़ी में आज मिलिये स्वर्ण कांता से.

बीबीसी में काम करती हैं. हम तो मुग्धा के नाम से जानते हैं. सुर की मम्मी और अराजक अविनाश की जीवनसाथी. साधारण परिवेश. अंग्रेज़ी की ठसक नहीं और न ही हिन्दी की दीन हीनता. स्वर्ण कांता के चेहरे पर सब सामान्य ही दिखता है. हलचल नज़र आती है,उनकी लिखावट में. दरअसल मैं जिस तरह से इस सीरिज़ को लिखना चाहता हूं,उसकी अकादमिक सलाहियत नहीं है. फिर भी मैं लिखना चाहता हूं.मैं स्वर्ण कांता से परिचय कराना चाहता हूं. उनसे भी स्वर्ण कांता को मिलाना चाहता हूं जो उन्हें जानते हैं. मैं हिन्दी की उन अनगिनत लड़कियों को स्वर्ण कांता से मिलाना चाहता हूं जो फेसबुक पर होती हैं तो सिर्फ अपने पति के लिए, पिता के लिए और तीज त्योहारों के लिए. मैं उन लड़कियों को स्वर्ण कांता से मिलाना चाहता हूँ जो अपना वजूद बनाने के लिए घर से बाहर निकल रही हैं ताकि अंग्रेज़ीदां दुनिया में प्रवेश करते वक्त उनके पांव कभी न थरथराए.

“ मुझे याद आता है, तब मेरी शादी तय हुई थी, लड़का नोएडा का था. बकायदा सगाई हो चुकी थी, मेरे होने वाले ससुराल के लोग रोज़ ही मुझे हिदायतें देते…रंग साफ करो, रोज नींबू लगाओ, बेसन लगाओ, धूप में अब मत निकला करो…मुझे बहुत बुरा लगता था…पर इसे बर्दाश्त करना मेरी नियति थी…शायद रिश्ता बनने से पहले ही कमजोर हो चुका था…एक विद्रोह मन में जड़ जमाने लगा था…अब तो मैं इसे संयोग ही…बल्कि बेहद सुखद संयोग कहूंगी…कि लगभीग इसी वक्त अविनाश दास मेरे जीवन में आए और मैंने फैसला पलट दिया. यहां मुझे मैं जो भी हूं…उसके साथ चाहा गया था…तोड़ दी मैंने वो सगाई ”

साँवली लड़की ने सगाई तोड़ दी,बग़ावत की ऐसी घटना आपने कब सुनी थी? क्या यह कोई सामान्य पोस्ट है?बीबीसी हिन्दी के फेसबुक पेज पर स्वर्ण कांता ने रंग को लेकर अपने अनुभव को पोस्ट ही नहीं किया बल्कि साक्षात कैमरे के सामने आकर कहा है. हम एंकरों की ज़बान में बिना किसी मेकअप के स्वर्ण कांता बुला रही हैं सबको कि आओ और अपनी कहानी कहो. कहते हुए मेरी तरह आज़ाद होने के सपने देखो. कदम बढ़ा दो. एक कमेंट के जवाब में वे लिखती हैं कि लोग उनके पति अविनाश को कल्लू बोलते हैं. यही बात अंग्रेज़ी की कोई लेखिका लिख दे या कलाकार लिख दे तो हम दुनिया आकाश पर उठा लेते हैं. ठीक ही करते हैं. किसी भी भाषा की लड़की जब बग़ावत करती है तो वो सारी ज़ुबान की औरतों की हो जाती है और जो मर्द बेहतर होना चाहते हैं,उनकी भी हो जाती है.

हिन्दी के पब्लिक स्पेस में ऐसे पोस्ट कितने होते होंगे. बहुत कम. बहुत लोग सांवले रंग, जिसे अब काले रंग के विकल्प के रूप में गोरे रंग की तरह लिखा जाता है, को लेकर सिसकते रहे होंगे लेकिन खुलकर बोलने लिखने की बारीकियां साहस से ज़्यादा की मांग करती हैं. स्वर्ण कांता का यह पोस्ट उन सामान्य लड़कियों के लिए छड़ी का काम करेगी जिन तक ऐसी बातों की समझ पहुंचते पहुंचते ज़माना गुज़र जाता है.

स्वर्ण कांता काफी सक्रियता से स्त्री के सवालों पर लिख रही हैं. कहीं से पढ़कर कहीं नहीं लिख रही हैं बल्कि अपने जीवन से जी कर लिख रही हैं. एक दिन उन्होंने एक आटो में आगे की सीट पर बैठ कर सेल्फी पोस्ट कर दी. एक हाथ में कैमरा है और उनका दूसरा हाथ आटो चालक के कंधे पर है. क्या आप कल्पना करना चाहेंगे कि इस दुस्साहस का असर चालक पर कैसा हुआ होगा. क्या यह सिर्फ एक मस्ती में किया गया कार्य है. नहीं, यह उन जगहों पर उन लोगों के साथ किया गया विद्रोह है जिन्हें पता ही नहीं है कि दूसरा पक्ष क्या है. स्त्री के सवाल उन अनजान जगहों में ले जाने का फन होना ही चाहिए और जोखिम तो होगा ही.

“और बैटरी रिक्शा में ड्राइवर की बगल में जा बैठी…ड्राइवर सकपका गया…मैं मुस्करा दी…कोई नहीं..धीरे धीरे सबको साथ चलने की आदत लग जाएगी…नहीं लगी…तो भी हमें अपना रास्ता बनाना ही है…”

आप इसे पढ़ते हुए उस दृश्य को याद कीजिए. दोहराइये. यह ध्यान रखते हुए यह घटना दक्षिण दिल्ली में नहीं घटी है. राजीव चौक मेट्रो से बाहर निकल कर बाराखंभा जाने के रास्ते में नहीं घटी है. बल्कि गाज़ियाबाद के उस रास्ते पर घटी है जो शाहदरा होते हुए बस अड्डा आता है. फेसबुक पर हिन्दी के स्पेस को करवां चौथ की तस्वीरों से मुक्त करातीं मुग्धा की ये पंक्तियां अगर आपको साधारण लगती हैं तो लगे. मुग्धा का रेंज बहुत बड़ा है. मैं उन्हें सिर्फ इस एक फ्रेम में नहीं बांधना चाहता लेकिन यही वो फ्रेम है जिसके ज़रिये मुझे आपको स्वर्ण कांता से मिलाने में आनंद आ रहा है. मुग्धा और स्वर्ण कांता एक ही पहलू के दो नाम हैं!

स्वर्ण कांता के पन्ने पर बग़ावत की बहुत छोटी छोटी तीलियां हैं. आपको सुर भी दिखेगी और अविनाश भी लेकिन स्वर्ण कांता का स्पेस आपको ज़्यादा बड़ा दिखेगा. अपने फेसबुक पेज पर उन्होंने अविनाश को उतनी ही जगह दी है जिससे उनका वजूद का अतिक्रमण न हो. मुझे उनका पन्ना बहुत प्रभावित करता है. पूरी दुनिया के किस्से हैं, साफ साफ राजनीतिक लाइन है, मगर मस्ती भी है. तस्वीरों में वे बेटी के साथ कभी मां जैसी नहीं दिखती हैं. दोस्त जैसी दिखती हैं. हिन्दी की लड़कियों की सीरीज़ की पहली नायिका के पन्नों को देखने के लिए जब भी चुपके से फेसबुक पर लॉग इन होता हूं, मुग्धा को पढ़ते हुए कुछ सीख लेता हूं. आप ये पोस्ट देखिये.

“ थोड़ा हिचकते हुए बोल ही दिया..कि आज पीरियड में हूं..पहला दिन है…कमर में तेज़ दर्द शुरू हो गया है..सीट पर बैठा नहीं जा रहा है…घर जाना चाहती हूं..मेरे शिफ्ट एडिटर बोले..हां हां..बिलकुल..जल्दी जाइये…मैंने तुरंत बस्ता उठाया…हाथ ज़रूर मिलाया और थैंक्यू भी कहा…फिर आई…पिछले दस दिनों से ब्रेस्ट में दर्द के बाद( पीरियड शुरू होने के पहले लक्षण) आज जब अंतत: पीरियड आ गया तो मैं दफ्तर में थी…मॉर्निंग शिफ्ट में…खैर हमें इसका इंतज़ाम रखने की आदत तो होती ही है…पर थोड़ी देर बाद 11 बजते ही कमर और पेट में दर्द शुरू हो गया…

कंप्यूटर पर काम करते करते…कभी सीट पर आगे होती तो कभी थोड़ा पीछे… पर धीरे धीरे…कमर दर्द तेज़ हो गया..सीधा बैठना मुहाल हो गया…सोचा कि इतनी देर से झेल रही हूं….बताती क्यों नहीं हूं…पहले तो ज़रूर थोड़ा संकोच….वो जिसे मैं कहती हूं कथित स्त्री सुलभ शर्म का…अनुभव हुआ…फिर मैंने डांटा खुद को…कि बातें बड़ी बड़ी…और आज जब मौका आया तो…फिस्स…फिर मुझे लगा कि कभी तो पहल करनी होगी…कभी तो…
थोड़ी हिम्मत बटोरी और कह दिया…और मैं अभी घर पर आराम कर रही हूं.

हम शिकायत तो करते हैं कि बाहर या दफ्तर में, काम की जगह पर हमाले लिए माहौल नहीं है, हमें माहवारी के दिनों में शारीरिक कष्ट में भी काम करना होता है..कोई नहीं सोचता…

पर इसके लिए पहले हमें आगे आना होगा, बोलना होगा…कहना होगा…

तभी कुछ बदलेगा…तो लड़कियों सखियों बोलो, बोलो…बोला…

फिर से थैक्यूं…सुशील दा…”

यह पोस्ट किसी भी धारदार कहानी और कविता से ज़्यादा शानदार है. अंग्रेज़ी में होती तो सीधा फेसबुक से उतर कर अख़बारों में और टीवी पर आ गई होती. अच्छी किताबों और यारबाज़ियों से वंचित हिन्दी की लड़कियों के जीवन में यह पोस्ट क्या बदलाव ला सकता है,आप ये कल्पना इसलिए नहीं करना चाहते क्योंकि आपको हिन्दी की लड़कियां दिखती नहीं हैं. वो सिर्फ कुचलने के लिए खोजी जाती हैं. वो जब प्रतिकार में उठती हैं तो हम सिर्फ लाइक्स चटका कर भाग जाते हैं. इस पोस्ट पर साहित्य से लेकर हिन्दी विभागों के तमाम कमरों में हंगामा मच जाना चाहिए था. ख़ैर.

स्वर्ण कांता के पोस्ट में तीन अच्छे लड़के भी दिखे. विनीत, जे सुशील और ड्राइवर.

तो आपको कैसी लगी स्वर्ण कांता. बहुत सारी फिल्में, बहुत सारी कविता और बहुत सारी किताबों की संगत नहीं मिली तो क्या हुआ…इनके पन्ने पर जाइये…आपको मोर्चे पर सबसे आगे दिखेंगी. तो हैं न शानदार…हिन्दी की लड़कियां सीरीज़ की पहली लड़की! अब दूसरी का इंतज़ार कीजिए.

सभार : नई सड़क

Comments

comments