गालिब खां | शिक्षा के प्रसार को बनाया जिंदगी का मकसद

बिहार की महिला करे पुकार

शराब मुक्त हो मेरा बिहार

इसतरह के छह नारे इन दिनों राज्य भर के सार्वजनिक स्थलों पर आपको दिख जाएंगे। करीब चार लाख 68 हजार से ज्यादा जगहों पर लिखे गए इन नारों में लोगों से शराब छोड़ने की अपील की गई है। सरकार की प्रतिष्ठा की बात बन चुके शराबबंदी अभियान को सफल बनाने के लिए जो लोग इन दिनों दिन रात काम कर रहे हैं, उनमें प्रमुख हैं मो. गालिब खां। शिक्षा विभाग के जन शिक्षा निदेशालय में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत गालिब किसी सरकारी अधिकारी नहीं, बल्कि एक साक्षरता अभियान के कार्यकर्ता की तरह शिक्षा के प्रचार-प्रचार में लगे रहते हैं।

कुछ दिनों पूर्व राज्य सरकार से जन शिक्षा निदेशालय को टास्क मिला कि प्रदेश में साक्षरता कर्मियों को गोलबंद कर व्यापक अभियान शुरू किया जाए। निदेशालय में इनके संयोजन में इस दिशा में काम शुरू हुआ। इस पूरे अभियान की योजना निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अभियान को सफल बनाने के लिए चार चरणों में योजना बनाई गई। पहले चरण में मद्य निषेध अभियान का शुभारंभ 21 जनवरी को श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में किया गया। इसका उद्‌घाटन खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया। इस कार्यक्रम का लाइव टेलिकास्ट सभी जिला मुख्यालयों में वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से किया गया।

इसके बाद इसके दूसरे चरण में 8 फरवरी से 25 फरवरी तक मद्य निषेध पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के सार्वजनिक क्षेत्रों पर मद्यनिषेद्य नारा लेखन अभियान चलाया गया और करीब चार लाख 68 हजार नारे लिखवाए गए। नारा लेखन के लिए इनके संयोजन में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें इसके लिए छह नारे निकल कर सामने आए।

अभियान के तीसरे चरण में सभी प्राथमिक, मध्य और माध्यमिक विद्यालयों में अभिभावकों से संकल्प पत्र भरवाए गए कि मैं शराब का सेवन नहीं करुंगा। जबकि चौथे चरण में बीते 24 फरवरी से सांस्कृतिक कारवां निकाला गया। इसमें 124 सांस्कृतिक टीमें शामिल हैं। यह टीमें राज्य के सभी जिलों और कुल 8439 पंचायतों में जाकर नुक्कड़ नाटक और गीतों की प्रस्तुति देगी। इस पूरे कार्यक्रम की परिकल्पना और योजना निमार्ण इनके द्वारा किया गया है।

1985से जुड़े हैं साक्षरता अभियान से

1985में बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में एडल्ट एजुकेशन सुपरवाइजर की नौकरी ज्वाइन करने के बाद से ही गालिब शिक्षा के प्रचार-प्रसार में लगे हैं। सरकारी नौकरी करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में अपने सृजनात्मक कार्यों के कारण राज्य में चर्चित रहे हैं। 1990 में नवादा में साक्षरता के लिए निकाले गए कला जत्था में एक कलाकार के तौर पर 42 दिनों की यात्रा की, जिसने इनकी जिंदगी में काफी बदलाव लाए। इसके बाद शिक्षा का प्रचार-प्रसार सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं बल्कि मिशन बन गया।

शिक्षा पर इनके काम के लिए इन्हें कई समारोहों में प्रशस्ति-पत्र दिया गया है। लेकिन, व्यक्तिगत तौर पर मो. गालिब खां मानते हैं कि शिक्षा के लिए काम करना उनकी अपनी इच्छा है। वह जीवन पर्यंत इसी काम को करना चाहते हैं।

शिक्षा शब्द में संसार की यात्रा

शिक्षाके क्षेत्र में करीब 32 वर्षों से कार्यरत गालिब कहते हैं कि शिक्षा शब्द से संसार की यात्रा है। शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके जरिए समाज के कमजोर और हाशिये के तबकों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। देश में हिन्दी पट्टी में जो तबका या व्यक्ति जितना अधिक हाशिये पर है, वह अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उतना ही सजग है। यह लोकतांत्रिक समाज के लिए सुखद संदेश है। अपनी आगामी योजना पर पूछने पर कहते हैं कि कुछ वर्षों में रिटायर हो जाऊंगा। रिटायरमेंट के बाद मेरी योजना है कि अपने गांव में जाकर बच्चों के लिए साइंस पार्क बनाउंगा और किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दूंगा।

शिक्षा पुरस्कार से हो चुके हैं सम्मानित

शिक्षाके क्षेत्र में इनके द्वारा किए गए कार्यों को राज्य सरकार ने भी सराहा है। इन्हें 2014 में बिहार सरकार का मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार मिल चुका है। गालिब स्त्री सशक्तिकरण, महिलाओं के अधिकार, समाज के कमजोर तबके के सशक्तिकरण के लिए भी आवाज उठाते रहे हैं। लैंगिक समानता पर 2014 के पटना पुस्तक मेले में इन्होंने स्टॉल लगाया था। इस स्टॉल पर पाश, फैज, नागार्जुन समेत विभिन्न कवियों की स्त्री अधिकारों और लैंगिक समानता की बात करने वाली कविताएं फ्लैक्स पर लगी थी।

कॉरपोरेट क्षेत्र की ऊंचे पैकेज की नौकरी जाने दी हाथ से

समाजको कुछ बेहतर देने और बेहतर समाज निर्माण में अपना योगदान देने की इच्छा युवा अवस्था से ही इनमें थे। इस बारे में एक सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि मेरा जन्म औरंगाबाद जिले के पिरो गांव में हुआ था। स्कूली शिक्षा यहीं से प्राप्त की। जब सातवीं बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक लाया तो मेरे शिक्षक पिता ने प्यारी जमीन नाम की एक नॉवेल उपहार में दी। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक की इस किताब ने जिंदगी पर गहरा प्रभाव छोड़ा। 1973 में मैट्रिक पास कर 1974 के छात्र आंदोलन से भी जुड़ा। आंदोलन के बाद 1977 आते-आते राजनीति से मोहभंग हुआ। फिर पटना यूनिवर्सिटी से एमकॉम किया इसके बाद यहीं से मैनेजमेंट में उच्च शिक्षा ग्रहण की। इसी बीच 1985 में एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी से नौकरी का ऑफर आया और सरकारी नौकरी भी मिल रही थी। तब बड़े असमंजस में पड़ गया कि क्या करूं। पिता चाह रहे थे कि कॉरपोरेट सेक्टर में अपना भविष्य संवारू, लेकिन मैं शिक्षा कार्यकर्ता बनने के लिए सरकारी नौकरी में गया।

Source

Comments

comments