तुम्हें मनकों से हार बनाना है | एक कविता बिहार से


एक कविता बिहार से’ के सफर की शुरुआत को दो महीने हो गये| इस सफ़र में आपका जो साथ मिला, सराहनीय रहा| जैसा कि हमने निर्णय लिया था, आखिरी पोस्ट मेरी, यानि आपके होस्ट की, अर्थात् नेहा नूपुर की होगी; उसी वादे को पूरा करते हुए, देशप्रेम को समर्पित इस महीने (अगस्त का महीना आज़ादी का महीना) को अंजाम तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं|
पटनाबीट्स के पाठकों के लिए विशेष तौर पर प्रस्तुत है, ‘एक कविता बिहार से’ में- “तुम्हें समय से आगे जाना है”|

तुम्हें समय से आगे जाना है

सुनो, देश के कर्णधार सुनो|
गुनो, नवीन उन्नत विचार गुनो|
बुनो, सपनों के नये आधार बुनो|
चुनो, ऊर्जा के औजार चुनो|
तुम्हें समय से आगे जाना है,
तुम्हें सरल समाज बनाना है||

खोलो मन के द्वार सभी,
सम्भलो, रोको भ्रष्टाचार अभी|
हो सके बचा लो बचपन तुम,
न हो देश में देह व्यापार कभी|
भरो अन्न के तुम भंडार,
करो नदिया सी रफ्तार,
तुम्हें वृहत संसार सजाना है,
तुम्हें समय से आगे जाना है||

कुछ कर्म करो, कोई बने नीति,
उठो, बदलो पहले राजनीति|
रच के खुद को तुम देश रचो,
अमरों की ये अनमोल कृति|
लिखो प्रीत मिटाओ खार,
यही जीवन का है सार,
तुम्हें मनकों से हार बनाना है,
तुम्हें समय से आगे जाना है||

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