तुम कहाँ हो ? | एक कविता बिहार से

1916 में गया के मैगरा गाँव में जन्में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी बिहार की साहित्यिक शान में एक और अनमोल रत्न हैं| हिंदी साहित्य से पहले संस्कृत में लिखा करते थे| इन्होंने 2 बार पद्म पुरस्कार लेने से मना कर दिया| मेघगीत, अवंतिका, कानन, अर्पण, तीर-तरंग, रूप-अरूप जैसे गीत-संग्रह में गीत एवं गजलें लिखने वाले इस कवि ने ‘गाथा’ और ‘राधा’ जैसे काव्य-कथा एवं काव्य-नाटक भी लिखे| इनकी कविताओं में प्रयोग तो है, छंद की पकड़ भी है, एक लय भी है| “एक कविता बिहार से” में आज शास्त्री जी की ऐसी ही एक कविता से आपका परिचय करवाते हैं- “तुम कहाँ हो?

तुम कहाँ हो ?

मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

सर पटक तट पर तरंगें लौट आईं
कण्ठ से टकरा उमंगें लौट आईं
घाट पर घट फूटता !- भाटा मचलता;
मैं अचल तल-ज्वार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

बादलों की फांक से जो झांकती हैं-
रश्मियाँ, तसवीर किसकी आंकती हैं-
खोखलेपन के बड़प्पन की?- गगन की?
मैं कि गर्द-गुवार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

शूल से तुलते यहाँ पर फूल फूले
उझकते, झुकते, अधर में कौन झूले!
डूब जाता मुख, सजल श्रृंगार ऐसा;
मैं अपत पतझार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

दीप की लौ अभी ऊँची, अभी नीची,
पवन की घन-वेदना, रुक आँख मीची;
अंधकार अबंध, हो हल्का कि गहरा,
मुक्त कारागार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

मुकुट-मणि, अनगिनत आंसू की बुंदकियाँ!
विजय की वीरानियों की-सी सिसकियाँ!
चाक सीने पर पड़ा पग, चरमराया;
खिलखिलाता खार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

जग वसंत बहार या मल्हार गाए,
छलछलाए दुर्ग, अधर डर मुस्कराए,
आग उगले, या शिशिर अनुराग बरसे,
मैं अछूते तार में हूँ, तुम कहाँ हो?
मैं मगन मझधार में हूँ, तुम कहाँ हो?

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