हमसे हमारा नाम ले हमको तुम्हारा नाम दे दो | एक कविता बिहार से

पटनाबीट्स पर  एक कविता बिहार से  में आज की कविता आई है पाठकों के बीच से| अनुराग कश्यप ठाकुर जी सीतामढ़ी जिले के रीगा गाँव से हैं| इंजीनियरिंग कर चुके हैं और अब घर से दूर दिल्ली में बसेरा है| कवितायें लिखने के शौक़ीन हैं और चाहते हैं कि कविता उनके अपनों, अर्थात् आपसब तक भी पहुँचे|
तो आज पाठक की कविता का स्वागत करिये और पढ़िये- ‘समर’|

समर

ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो,
विष तजे मस्तक को तुम शीतल शशि का साथ दे दो|

न समय तक साथ देना,राह में तो हाथ दे दो।
न सुनहरा दो सवेरा, चाँदनी एक रात दे दो|
अमृत भरे गागरों से तृप्त होना कौन चाहे,
इस धधकती आग को तुम हवा का प्यास दे दो|
ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो|

पर्वतों से छन के आती रश्मि की गुणगान मत दो,
सख्त हृदयों में पनपते प्रीत की पहचान मत दो|
पर्वतों से टूट कर पत्थर बिलखते है बहोत,
भाव भंगिम पत्थरों को शिल्प का विश्वास देदो|
ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो|

एक गज़ल की तार बन कर मुझको मेरा नाम मत दो ,
गैर बन करतलध्वनि से मुझको ये सम्मान मत दो|
जो शिकायत सबसे है तुम से भी वो कैसे करें?
गैर सा सम्मान मत दो, प्रेम का उपहार दे दो|
ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो|

वर्षों से प्यासी भूमी को मेघ की बौछार मत दो,
याद में उजड़े चमन को श्रावणी श्रृंगार मत दो|
पर सुनो इस भूमि के जलते ह्रदय की वेदना ,
आज रश्मि के रथी को बादली अवकाश दे दो|
ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो|

क्षुब्ध हो मन से हमें मधुयमनी सौगात मत दो,
करके आलिंगन भले तुम चुम्बनी बरसात मत दो|
कोशिशें इतनी रहें कि प्यार न बदनाम हो,
हमसे हमारा नाम ले हमको तुम्हारा नाम दे दो|
ख्वाहिशों के इस समर को शांति का एहसास दे दो|

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