एक कविता बिहार से: पटना की युवा कवियत्री पूजा कौशिक की कविता, ‘आइना’

एक कविता बिहार से में आज हम आपके सामने ले कर आये हैं पटना की एक नवोदित युवा कवियत्री पूजा कौशिक की कविता। पटना के युवाओं के बीच पूजा एक लेखिका और वक्ता के तौर पर अपनी एक पहचान बना चुकी हैं। इनकी कविताओं की बात करें तो इनके विषय का दायरा काफी बड़ा और युवा वर्ग के भावनाओं और अनुभवों से अंतरंग जुड़ाव का होता है। सरल शब्दों और लहजे में समाज से जुड़े जटिल मुद्दों पर अपनी बात कह जाना इनके लेखन की खासियत है। हिंदी कविता का दायरा हर वक़्त और परिवेश के सृजनात्मक व्यक्तियों के योगदान से बढ़ता ही जा रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफार्म के आने से एक अलग किस्म की साहित्यिक विधा उत्पन्न हुई है जिसने युवाओं के बीच ओपन माइक जैसे आयोजनों की बदौलत अपनी गहरी पैठ बनाई है और इस तरह की कविता जिसकी पहुँच और जिसका असर इतने बड़े समूह पे है उसे नज़रअंदाज बिलकुल भी नहीं किया जा सकता। पूजा कौशिक की रचनायें इस युवा समूह के बीच पहुँच कर उनको प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

तो लीजिये पेश है पूजा कौशिक की एक कविता बिहार से जिसका शीर्षक है, ‘आइना’ :

इस झूठ की दुनिया में एक सच सिमटा है
हर कमरे की इक दीवार पर,
बचपन को देखा, आंसुओं को भी देखा,
चहचाहट का गवाह बना,श्रृंगार का सम्मान बना
कभी उन मायूस आँखों का निखार बना,
कभी उन उलझे बालों की पहचान बना
आज दुनिया के सामने हँस भी दूँ तो
आँखों में छुपे दर्द का निशान बना,
ये झूठ की दुनिया में सच का ज्ञान बना.”
एहसासों की टंगे हुए मुखौटों का जीता हुआ निशान बना,
पारदर्शी है सब कुछ ये कहकर
दुनिया में तुम्हें-मुझे सबकों बराबर का अधिकार दिया
तू गीता पढ़े या कुरान,
है वो एक नज़र जिसने एक सा अभिमान दिया
सुंदर ना मैं हूँ ना सुंदर है तू,
उस आंख में इन्सान और पत्थर भी धूँ।
राजा या सेवक तू बस उसका एक शिकार बना,
रेत लाकर रख सामने या पानी की बौछार कर,
वो सच ही दिखाएगा,
उस पर तू विश्वास कर क्योंकि
इस झूठ की दुनिया में एक सच सिमटा है
हर कमरे की इक दीवार पर,
मैंने उसे आईना कहा ,तो कहीं वो हर चेहरे का इतिहास बना।

Photo by: Bashshar Habibullah
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