एक ज़िंदा कविता | एक कविता बिहार से

श्री पवन श्रीवास्तव जी, छपरा जिला के मढौरा में 11 मई 1982 को जन्में| ये बिहार के ऐसे पहले फिल्म मेकर हैं, जिन्होंने इंडिपेंडेंट क्राउड फंडेड फिल्म बनाई, ‘नया पता’ ’| ये फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहे हैं और उसी गति से कवितायेँ और ब्लॉग भी लिखते आये हैं|
एक कविता बिहार से” में आज पवन श्रीवास्तव जी की ये बेहतरीन कविता शामिल हो रही है, उनकी इजाजत के साथ| ‘बेहतरीन’ का विशेषण पहले ही लगा दिया गया है, आप भी पढ़ कर यही कहेंगे| तो क्या वाकई कवितायेँ जिंदा भी हो सकती है? आईये पढ़ते हैं- ‘एक जिंदा कविता’|

एक ज़िंदा कविता

बहुत मुश्किल है एक
ज़िंदा कविता लिखना
जीवन की तरह ही
जटिल और अनगढी होगी
एक ज़िंदा कविता ।

बारिश में भींगते हुए,
तौलिए से बाल पोछते हुए,
किसी के होंठो को चूमते हुए,
किसी को बाहों में लेकर,
जब पेड़ों से पत्ते झड़ते हैं,
तब नहीं लिखी जाती हैं कवितायें|
अक्सर कविताएं,
पहले या बाद में लिखी जाती हैं,
या फिर तब जब वो हो नहीं पाती हैं ।

लड़ते वक्त,
सपने देखते समय,
रोते हुए,
रोटियां बेलते हुए,
बोझा उठाए हुए,
या थकान से चूर होकर,
कवितायेँ नहीं लिखी जाती|
अक्सर कवितायेँ,
घर में बैठकर,
रातों को जागते हुए,
आंसुओं के सूखने के बाद,
सर से बोझा उतारने के बाद,
रोटी खा लेने के बाद,
या थकान मिटने के बाद,
लिखी जाती हैं|

क्यूंकि बहुत मुश्किल है
ज़िंदा शब्द लिखना
नंगी और कड़वी होगी एक ज़िंदा कविता

इसलिए हम चाहकर भी
कविताओं को जी नहीं पातें
कविताओं में जीवन नहीं मिलता
उसमे दर्शन हो सकता है
या एक अनुभव
या फिर इच्छाएं हो सकती हैं
लेकिन जीवन नहीं ।

मरी हुई है आज के दौर की कविता
और जीवन की तरह ही बनावटी भी
अब बहुत मुश्किल है एक
ज़िंदा कविता लिखना
उतना ही जितना
मुश्किल हो गया हैं
एक ज़िंदा जीवन जी लेना|

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