गंगा-स्तुति

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे | एक कविता बिहार से

माँ तेरी निर्मलता की दरकार तो है

कब तक टालेंगे, कि सरकार तो है!

 

माँ गंगा की पवित्रता आज भी हर धर्म के लिए पूजनीय है, लेकिन निर्मलता के नाम पर अभी मेरे जेहन में यही पंक्ति बनकर आई| गंगा माँ की स्तुति की बात हो और महाकवि विद्यापति की बात न हो, ऐसा बिहार में होना मुमकिन नहीं| जनश्रुति की मानें तो विद्यापति की यह स्तुति माँ गंगे ने स्वीकार भी की थी और उनके अंतिम समय में उन्हें दर्शन भी दिए थे| तो आईये आज “एक कविता बिहार से” में पढ़ते हैं लोक जीवन के गायक, बिहार के दरभंगा जिले में 1360 ई० में जन्में, मैथिल कोकिल के नाम से सुप्रसिद्ध रससिद्ध कवि विद्यापति की गंगा-स्तुति| हर-हर गंगे!

गंगा-स्तुति

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे|

छोड़इत निकट नयन बह नीरे||

कर जोरि विनमओं विमल तरंगे|

पुन दरसन होए पुन मति गंगे||

एक अपराध छेमब मोर जानी|

परसल पाय पारू तुअ पानी||

कि करब जप-तप जोग ध्येआने|

जनम कृतारथ एकहि सनाने||

भनई विद्यापति समदओं तोही|

अन्त काल जनु विसरहु मोहि||

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Neha Nupur

Neha Nupur has been interested in Music and Poetries since her childhood. She completed her initial education from Tagore Academy and started writing poems. She loves to read poetries and listen classical music.