नाम पुछई छै राम कहै छै अबध के राजकुमार छै | एक कविता बिहार से

हर बुराई का नाश होना सुनिश्चित है ताकि अच्छाई की जय-जयकार हो सके| इसी धारणा को सम्पूर्ण करती है भगवान् राम की रावण पर मिली जीत| इस जीत की ख़ुशी में दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है| रावण का दहन किया जाता है तथा प्रभु राम की स्तुति की जाती है| पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ की यह कड़ी भी प्रभु राम को समर्पित है| कवि हैं मैथिल कोकिल के नाम से सुविख्यात कवि विद्यापति| हालाँकि स्तुति तो एक भाव है जिसकी कोई भाषा नहीं होती, परन्तु कवि विद्यापति की यह स्तुति मैथिलि में है| कवि विद्यापति के भक्तिरस के कवि माने गये हैं, जिनका जन्म 1380 ई० में हुआ| इनका जन्मस्थल बिहार के मधुबनी जिले का बिसपी ग्राम है| ‘एक कविता बिहार से’ में आज पढ़ते हैं सिया-राम विवाह के प्रसंग की यह कविता, कवि विद्यापति के शब्दों में|

तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै,
घुमि रहल छै जनकबाग में फूल तोरथ लेल ठाढ़ छै|

श्याम रंग जे सबसँ सन्नर से सबहक सरदार छै,
नाम पुछई छै राम कहै छै अबध के राजकुमार छै|

धनुष प्रतीज्ञा कैल जनकजी के पूरा केनीहार छै,
देस-देस के नृप आबि कढ धनैत अपन कघर छै|

कियो बीर नहि बुझि पड़ै जछि तँ जनक के धिक्कार छै,
एतबा सुनतहिं बजला लक्ष्मण ई कोन कठि पहार छै|

बुझबा में नहिं अयलन्हि जनक कें एहि ठाम शेषावगर छै,
चुटकी सँ मलि देब धनुष के ई त बड़ निस्सार छै|

उठि क विश्वामित्र तखन सँ रा के करैत ठाढ़ छै,
जखनहिं राम उठोलन्हि धनुष मचि गेल जय-जय कार छै|

धन्य राम छथि धन्य लखनजी जानैत भरि संसार छै,
साजि सखी के संग सीयाजी हाथ लेने जयमाल छै|

तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै||

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