दुनिया ऐसी हुआ करती थी , एक कविता बिहार से

दुनिया ऐसी हुआ करती थी | एक कविता बिहार से

ओ माँ! ये दुनिया
तेरे आँचल से छोटी है|”

 

ये पंक्तियाँ हैं नीलोत्पल मृणाल जी की, जिनकी पहचान एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित हो रही है| अप्रेल 2015 में प्रकाशित इनकी पहली ही पुस्तक ‘डार्क हॉर्स’ के 5 संस्करण आ चुके हैं, जो पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं और अब छठे संस्करण के प्रकाशन की तैयारी भी हो रही है| इतना ही नहीं, इस किताब के लिए नीलोत्पल जी को साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2016 से भी नवाजा गया है|

25 दिसम्बर 1984 को जन्मे श्री मृणाल जी मूलतः बिहार के मुंगेर जिला से सम्बन्ध रखते हैं| इनकी शिक्षा-दीक्षा झारखण्ड में हुई और फ़िलहाल सिविल सर्विस की तैयारी हेतु दिल्ली में रहते हैं| ‘डार्क हॉर्स’ के जरिये सिविल सर्विसेज की तैयारी करते युवाओं की कहानी कहने वाले मृणाल जी कविता भी करते हैं|
पटनाबीट्स के माध्यम से एक कविता बिहार से में आज लाये हैं इस युवा रचनाकार की कविता ‘दुनिया ऐसी हुआ करती थी’|दुनिया ऐसी हुआ करती थी

दुनिया ऐसी हुआ करती थी

थोड़ा सा नदी का पानी, मुट्ठी भर रेत रखलो,
धान-गेहूँ-सरसों वाले, हरे-हरे खेत रखलो|
रखलो एक बैल भईया, हल से बाँध के,
दुअरे पर गाय खड़ी हो, चारा खाए सान के|
पूछेगा जो कोई तो उसको बतायेंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखायेंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी|

स्कूल के पीछे वाला अमरुद का पेड़ रखलो,
पोखर के पीढ़ खड़ा वो खट्टे-मीठे बेर रखलो|
एक-दो बगिया रखलो, बगिया में फूल रे,
तितली और भौंरे जहाँ खेलें मिलजुल रे|
पूछेगा जो कोई तो उसको बतायेंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखायेंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी|

माटी का चूल्हा रखलो, फूस की चुहानी रे,
मिट्टी के एक घड़े में ठंडा-ठंडा पानी रे|
बैठ के जमीन जहाँ हो खाने की छूट रे,
तावे से रोटी लेते गरम-गरम लूट रे|
दादी-नानी के खिस्से, बाबा की डांट रखना,
आंगन में लगने वाली बुढ़िया की खाट रखना|
सोफे तुम लाख लगा लो, बाबा की चौकी रखना,
उसपर एक पतला बिछौना, लोटा और पानी रखना|
रखना वही एक लालटेन, लालटेन में तेल रे,
रात करे जहाँ चाँदनी रौशनी से खेल रे|
पूछेगा जो कोई तो उसको बतायेंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखायेंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी|

गाँव में एक मेला रखना, सर्कस और खेला रखना,
चाट और पकौड़ी वाले एक-दो ठेला रखना|
याद रखना झालमुड़ी का मर्चा तूफानी रे,
गुपचुप में पीने वाला इमली का पानी रे|
होली के रंग बचा लो, दिवाली के दीप रे,
भोर की अजानें रखना, छठ वाले गीत रे|
भूल नहीं जाना अपने लोक-व्यवहार रे,
पुरखों से मिले हुए सब तीज-त्यौहार रे|
पूछेगा जो कोई तो उसको बतायेंगे,
आने वाली पीढ़ियों को चल के दिखायेंगे,
कि दुनिया ऐसी हुआ करती थी|

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Neha Nupur

Neha Nupur has been interested in Music and Poetries since her childhood. She completed her initial education from Tagore Academy and started writing poems. She loves to read poetries and listen classical music.