किनका दुःख तलाश रहा है ढोलकिया | एक कविता बिहार से

शाहंशाह आलम जी यूँ तो बिहार विधान परिषद् में नौकरी करते हैं, लेकिन कविताओं और कविताओं से समबन्धित हर क्रियाकलाप में रुचि रखते हैं| इनकी विभिन्न किताबों पर दी गयी टिपण्णी (समीक्षा) भी काफी पसंद की जाती है| अक्सर अपनी रचनाओं के जरिये पत्र-पत्रिकाओं में जगह पाते रहते हैं| कला जगत में गहरी रुचि रखने वाले इस कवि का ताल्लुक बिहार के मुंगेर जिला से है और फ़िलहाल पटना के निवासी हैं|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ के लिए शाहंशाह आलम जी ने सौंपी है अपनी एक मशहूर कविता ‘ढोलकिया’, जो वर्तमान परिस्थिति की ओर इशारा करती है| तो आइये सुनते हैं ‘ढोलकिया’ के थाप को, इस कविता के माध्यम से|

‘ढोलकिया’

ढोलकिया अपनी ढोलक बजाता है
कभी आहिस्ता कभी ज़ोर से
जिस तरह वह हँसता रहा है
कभी आहिस्ता कभी ज़ोर से
लेकिन इन दिनों ढोलकिया
ढोलक बजा रहा है बिना मुस्कुराए
अपने दुखों का तर्जुमा करते हुए
दुखों के इस तर्जुमे में
किनका दुःख तलाश रहा है ढोलकिया
दरख़्त के साए में दरख़्त से टिका
आपको पता हो न हो
मुझे पता है ढोलकिया
ढोलक के स्वर को साध रहा है
जिस सफ़ाई से
जिस मेहनत से
जिस लगन से
अपने दुखों को साध कहाँ पा रहा है
उसी जतन से चाहकर भी
दुःख अनगिन हैं जिन्हें
ढोलकिया बिना गिने व्यक्त करता है
अपनी ढोलक पर थाप दे-देकर
सन्नाटे को भगाते-तोड़ते
लेकिन हमारे दुखों को
हर दिन बढाती सरकारें
संभलती कहाँ हैं
बाज़ आती कहाँ हैं ऐसा करने से
ढोलकिया के विरोध-स्वर को सुनकर भी
उनके दुखों के कारण जानकार भी
यह भी सच है
हर ढोलकिया जाग रहा है
अपने विरोध को साधते हुए
अपनी ढोलक की आवाज़
दूसरे ढोलकिया तक पहुँचाते हुए
ढोलकिया को पता है
ऐसे ही एक-दूसरे की आवाज़ों को जोड़कर
इन पॉकेटमार
इन आदमीमार
इन जीवनमार सरकारों से
मुक्ति का रास्ता निकलेगा
किसी न किसी रोज़ ज़रूर।

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