बटोहिया

सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया | एक कविता बिहार से

30 अक्टूबर 1884 ई० को बिहार के छपरा जिला (दहियावां) में जन्में श्री रघुवीर नारायण जी की कविता बटोहिया के बारे में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा था, “बाबु रघुवीर नारायण बिहार में राष्ट्रीयता के आदिचारण और जागरण के अग्रदूत थे | पूर्वी भारत के ह्रदय में राष्ट्रीयता कि जो भावना मचल रही थी , वह पहले पहल उन्ही के ‘बटोहिया’ नामक गीत में फूटी और इस तरह फूटी कि एक उसी गीत ने उन्हें अमर कवियों कि श्रेणी में पंहुचा दिया”|
छात्र जीवन में इंग्लिश में लिखने वाले श्री रघुवीर नारायण की पहचान ‘खड़ी बोली के पहले बिहारी कवि’ के रूप में बनी| ‘बटोहिया’, बिहार के प्रथम राष्ट्रगीत का दर्जा रखती है | स्त्रोत बताते हैं कि 1970 तक 10वीं और 11वीं बिहार टेक्स्ट बुक के हिंदी काव्य की पुस्तक के आवरण पर यह कविता अवश्य होती थी| सिर्फ बिहार या भारत ही नहीं, मारीशस, त्रिनिदाद, फिजी, गुयाना इत्यादि जगहों तक, जहाँ भी भोजपुरी जानी जाई जाती है, वहाँ इसकी लोकप्रियता थी|

आज पटनाबीट्स के पाठकों के लिए एक कविता बिहार से की कड़ी में प्रस्तुत है ये भोजपुरी की प्रचलित कविता जिसे स्वतंत्रता संग्राम के समय जन-जागरण गीत की तरह चहूँ ओर गाया गया और जिसने ‘वन्दे मातरम’ की तरह सम्मान और उपलब्धि पायी|

बटोहिया

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया |
एक द्वार घेरे रामा हिम-कोतवलवा से
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया||

जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहवां कुहुंकी कोइली बोले रे बटोहिया|
पवन सुगंध मंद अगर चंदनवां से
कामिनी बिरह-राग गावे रे बटोहिया||

बिपिन अगम घन सघन बगन बीच
चंपक कुसुम रंग देबे रे बटोहिया |
द्रुम बट पीपल कदंब नींब आम वॄ‌छ
केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया||

तोता तुती बोले रामा बोले भेंगरजवा से
पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया |
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया||

गंगा रे जमुनवा के झिलमिल पनियां से
सरजू झमकी लहरावे रे बटोहिया |
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया||

उपर अनेक नदी उमड़ी घूमड़ी नाचे
जुगन के जदुआ जगावे रे बटोहिया |
आगरा प्रयाग काशी दिल्ली कलकतवा से
मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया||

जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहां ऋषि चारो बेद गावे रे बटोहिया |
सीता के बीमल जस राम जस कॄष्ण जस
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया||

ब्यास बालमीक ऋषि गौतम कपिलदेव
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया|
रामानुज-रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया||

नानक कबीर गौर संकर श्रीरामकॄष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया |
बिद्यापति कालीदास सूर जयदेव कवि
तुलसी के सरल कहानी रे बटोहिया ||

जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखि आउ
जहां सुख झूले धान खेत रे बटोहिया |
बुद्धदेव पॄथु बिक्रमा्रजुन सिवाजी के
फिरि-फिरि हिय सुध आवे रे बटोहिया ||

अपर प्रदेस देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड़ रे बटोहिया|
सुंदर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेही
जन ‘रघुबीर’ सिर नावे रे बटोहिया||

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Neha Nupur

Neha Nupur has been interested in Music and Poetries since her childhood. She completed her initial education from Tagore Academy and started writing poems. She loves to read poetries and listen classical music.