आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी| एक कविता बिहार से

एक कविता बिहार से” में आज आप पढ़ेंगे हिंदी काव्यजगत के उन चंद कवियों में शुमार कवि को जिनकी पहुँच आम ग्रामीण नागरिक से लेकर धनिक शहरी वर्ग तक रही है| इनके विषयों में इतनी विविधता और व्यापकता है कि हमसब कहीं-न-कहीं इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| हिंदी के अलावा ये बांग्ला, संस्कृत और मैथिलि में भी लिखते थे| मैथिलि में ये ‘यात्री’ के नाम से जाने गये| हम बात कर रहे हैं “जनकवि” के उपनाम से सम्मानित कवि “बाबा नागार्जुन” की| 30 जून 1911 ई० को बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी गाँव में जन्में इस कवि का मूल नाम “वैद्यनाथ मिश्र” था| ये उन कवियों में हैं जो कविता के नाजुक बन्दों का प्रयोग सरकार के प्रति करारे तेवर दिखाने में भी करते रहे थे| 1961 में ब्रिटिश रानी एलिज़ाबेथ के भारत भ्रमण पर लिखी गयी यह मशहूर कविता तात्कालिक ज्वलंत मुद्दे पर उनकी नज़र और पकड़ जाहिर करती है| भारत की तात्कालिक स्थिति दिखाती इस कविता में आज की परिस्थिति के अनुरूप भी उतनी ही सार्थकता और गंभीरता स्पष्ट झलकती है| फ़िलहाल कविता के कटाक्ष के मजे लेने के लिए पढ़िये- “आओ रानी”|


आओ रानी

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

आओ शाही बैण्ड बजायें,
आओ बन्दनवार सजायें,
खुशियों में डूबे उतरायें,
आओ तुमको सैर करायें–
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

सैनिक तुम्हें सलामी देंगे
लोग-बाग बलि-बलि जायेंगे
दॄग-दॄग में खुशियां छ्लकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र के भाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,
हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,
टहनी हो तुम भारी-भरकम डाल की
खोज खबर तो लो अपने भक्तों के खास महाल की!
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने की थाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो
दायें-बायें खडे हज़ारी आफ़िसरों से प्यार लो
धनकुबेर उत्सुक दिखेंगे, उनको ज़रा दुलार लो
होंठों को कम्पित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो

यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेडो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

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