देसीपन की मिठास लिए ‘एक कविता बिहार से’ में चेतन कश्यप की भोजपुरी कविता

कविताएं ज़िन्दगी का सारांश लिखने का सबसे अच्छा माध्यम है और शायद इसीलिए कविताओं की यह खासियत होती है कि बड़े से बड़े घटनाक्रम को चंद पंक्तियों में बयान कर देती हैं। ‘भाषा’, उन्हीं कविताओं को किसी खास जगह से जोड़ने का काम करती हैं। वैश्विक भाषाओं में अवश्य ही कविताएं ज़्यादा पढ़ी जाती हों मगर, एक देसीपन उसमें क्षेत्रीय भाषाएं ही लाती हैं। इसी देसीपन की एक मिसाल हम आज ‘एक कविता बिहार से‘ में चेतन कश्यप की भोजपुरी कविता पढ़ते हुए महसूस करेंगे।

मुंगेर में पैदा हुए चेतन कश्यप बैंक में नौकरी करते हैं और अपने अंदर की हलचल को बाहर लाने के लिए पन्नों पर कविताएं उकेरते हैं। उनकी पहली किताब ” चाँद के दर पर दस्तक” इसी हलचल का एक उदाहरण है। आप शायद यह भी सोचें कि भोजपुरी तो मुंगेर की भाषा नहीं है तो चेतन भोजपुरी में कैसे लिखते हैं। चेतन अपने शुरुआती दौर में कुछ साल बेतिया में रहे और वहीं भोजपुरी सीखी।

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प्रस्तुत कविता में चेतन ने बिहार के चैत के मौसम, संघर्षशीलता और देसी भाषा का समावेश किया है। तो आज प्रस्तुत है ‘एक कविता बिहार से’ में चेतन कश्यप की कविता:

चेतन कश्यप

 

चैत के महीनवा में

देह के दरदवा

मन के दरदवा से

कम नइखे रामा

के ले के जाइ हमरा

के ले के आइ हो

मन ओझरायल कोनो

कम नइखे रामा

नीमवा के फलवा से

खूनवा त होला साफ

मनवा के साफ करी

तम नइखे रामा

दूसरा के का कहीं

अपने थकल बानी

कुच्छो ठीक होइ, इ

भरम नइखे रामा

सोचले त का रहीं

करले त बानी का

मन कठुआइल कोनो

गम नइखे रामा

उमरिया पे मत जा

डगरिया पे मत जा

केहु कहले होइ

हम नइखे रामा

जीते के बा, जीतऽ खुद के

लड़े के बा, लड़ऽ खुद से

औरो कोनो गत के

करम नइखे रामा

 

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Mayank Jha

Mayank Jha is a 20 something years old content writer and an English major. A writer by day and reader by night, he is loathe to discuss about himself but can be persuaded to do so from time to time.