क्या बिहार सिर्फ नायक प्रधान देस है ?

बिहार में विशेषज्ञ कदम-कदम पर मिलेंगे, राजनीतिक विश्लेषक तो हर चौक—चौराहे पर. जो नामचीन विशेषज्ञ हैं वे तो हर विषय पर हरवक्त बोलने को तैयार बैठे रहते हैं. कई नामचीन विशेषज्ञों से जानने की कोशिश कई बार की कि आखिर बिहार में सामंती तो सामंती, प्रगतिशील भी अहम जड़ताओं को क्यों नहीं तोड़ पाये? बिहार को गुमान रहता है कि 1857 की क्रांति में उसकी भूमिका रही, आजादी की लड़ाई में बिहार अग्रणी रहा, आजादी के बाद जेपी की लड़ाई की जमीन बिहार रही, नक्सल आंदोलन भले नक्सलबाड़ी से निकला लेकिन उर्वरा होने की जमीन बिहार में ही तैयार हुई. इन सबके इतर बिहार विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से लेकर और भी न जाने कितने आंदोलनों में अगुवाई का दावा ठोंकता है. मान लेते हैं और कुछ हद तक सच्चाई भी है कि इनमें बिहार की भूमिका रही. हो सकता है सब दावे सही हों लेकिन यह बात हमेशा खठकते रहती है कि इतने आंदोलनों ने क्या बिहार में सिर्फ नेताओं, कवियों, लेखकों यानि पुरूष वर्ग के नेतृत्व को ही उभारा! क्या किसी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका नहीं रही. ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि इतने सार्थक और बड़े आंदोलनों में से सिर्फ कवि, नेता, लेखक निकलते रहे, कवियत्री, लेखिका, नेत्री आदि नहीं. इसका एक मतलब तो यह हुआ कि भले ही बिहार बड़े स्तर पर लड़ाई लड़ता रहा, आंदोलन पर आंदोलन करता रहा, आंदोलनों में भूमिका निभाता रहा लेकिन अपने बिहार में जिस विषय पर यानि मर्दवादी और सामंती संस्कृति के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए थी, वह नहीं लड़ सका. क्योंकि ऐसा नहीं कह सकते कि महिलाओं की भूमिका ही नहीं रही.

1857 की लड़ाई तो बताता है कि धरमन जैसी महिलाएं वीर कुंवर सिंह से कदम से कदम मिलाकर कदमताल कर रही थी.फिर बिहार में नायिकाओं का उभार अब तक क्यों नहीं हो सका? यह बात मैं बार—बार अपने साथियों से कहता हूं कि पूरे बिहार को छोड़ भी दें तो सिर्फ पटना को ही देखते हैं, हर चौक—चौराहे पर प्रतिमाएं हैं, नये चौक—चौराहे और पार्क प्रतिमाओं के लिए निकाले भी गये हैं लेकिन इक्का-दुक्का अपवाद को छोड़ दें तो कहीं महिलाएं नहीं मिलेंगी. संघर्ष और सृजन के क्षेत्र में तो खैर सूचि बनाएंगे तो महिलाओं का नाम बताया ही नहीं जाएगा? ऐसा क्यों? क्या बिहार के किसी आंदोलन में, सुंदरतम बिहार के निर्माण में महिलाएं शामिल ही नहीं थी या कि हमारा मन—मिजाज जड़वत रहा. यह खयाल इन दिनों इसलिए भी ज्यादा आने लगा है, क्योंकि देखता हूं कि बिहार की कई महिलाएं लगातार अपने—अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं. दूर देस रहकर भी अपनी माटी से गजब का मोह रखे हुए हैं और अपनी संस्कृति की धार को मजबूत कर रही हैं, उसके दायरे का विस्तार कर रही हैं.

पिछले कई दिनों से बिहार की एक महिला सृजनकार के एफबी के सारे पोस्ट आदि गंभीरता से फॉलो कर रहा हूं. वह महिला कोई और नहीं विभा रानी हैं. कभी बात—मुलाकात नहीं है उनसे, लेकिन उनके एफबी पोस्ट को देख लगता है कि क्या विभा जी किसी और राज्य की होती तो उनका राज्य उनकी ओर से नजरे फेरे रहता. कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि विभा जी बिहार रहती नहीं हैं न! लेकिन यह कुतर्क होगा. दरअसल बिहार के सांस्कृतिक गलियारे में तो बिहार में भी रहने का कोई मतलब नहीं, पटना रहिए तो आप बिहारी माने जाएंगे और इसके आधा दर्जन वैसी महिलाओं के हैं, जो रहते बिहार में हैं लेकिन पटना से आमदरफ्त का रिश्ता नहीं है तो उनकी कद्र नहीं होती. इस मायने में झारखंड बिहार से बहुत खूबसूरत हो जाता है और बहुत आगे की चीज भी, कुछ ज्यादा प्रगतिशील भी. साहित्यिक—सांस्कृतिक संदर्भ में झारखंड में यह आवश्यक शर्त नहीं है कि आप रांची रहें या रांची में आकर सांस्कृतिक मठाधीशों के दरबार में हाजिरी बनाते रहें, तभी आप हैं और आपके कुछ होने का मतलब हैं. रही बात विभा जी की तो उन्हें समझना होगा. सेलिब्रेटिंग कैंसर नाम से जो वह अभियान चला रही है. समरथ कैन नाम से काव्य संग्रह लाने के बाद उसे लेकर जिस तरह से वे आयोजन कर रही हैं और देश भर के रचनाकारों को एक रचना को केंद्र में रखकर जोड़ रही हैं, वह कोई मामूली काम नहीं. उनके इस जिद—जुनून को देख समझा जा सकता है कि कितनी जीवटता है उनमें, कितनी उर्जा है उनमें. समरथ कैन को भी छोड़ दें तो यह देखिए कि वे कैसे अहमदाबाद या मुंबई में रहकर भी मैथिली के लिए भी काम कर रही हैंं. अभी हाल में उनका मैथिली गारी वाला एक सीरिज देखा!

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विभा जी की सक्रियता देखिए. वे एक साथ कितने मोरचे पर सक्रिय रहती हैं. हमें उनकी सक्रियता और उत्साह में हमेशा एक किशोर जैसा जोश दिखता है. सिर्फ समरथ की बात नहीं है, जब वे नटरंगिनी जैसा सोलो प्ले करती हैं, या करने जा रही होती हैं तो जिस उत्साह से बताती हैं, वह अलग से उर्जा को दिखाता है. अवितोको रूम थियेटर की शुरुआत की तो वही उत्साह. हर बार की प्रस्तुति को इतनी उर्जा, इतने उत्साह, इतनी खूबसूरती से बताती हैं कि वह सब देखते ही बनता है. एक साथ गीत—संगीत, नृत्य, नाटक, लेखन, कवि कर्म…कितने मोरचे पर सक्रिय रहती हैं. वह भी एक गंभर बीमारी से जूझते हुए, बीमारी को हराकर. 50 पार की उम्र में एक साथ इतनी विविधता के साथख्, इतने क्षेत्रों में सक्रिय, सिर्फ सक्रिय नहीं किशोर जैसा सक्रिय, कम ही महिला मिलेंगी. बिहार के स्तर पर भी और देश के स्तर पर भी. लेकिन बिहार में कभी विभा जी को बहुत प्यार से, बिहारीपन के रिश्ते की गरमाहट की कद्र करते हुए बुलाया गया हो, कोई सम्मान—प्रतिष्ठा वगैरह दिया गया हो, यह मुझे नहीं मालूम. बिहार में सरकार भी अब वही करती है, जो बिहार की नये—नवेले सांस्कृतिक मठाधीश चाहते हैं. मठाधीशों के गैंग के बारे में न पूछिएगा.आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं.

बिहार के मठाधीशों से विभा जी जैसी महिलाओं के कृतित्व में ज्यादा रुचि नहीं लेने की वजह पूछा हूं. अपना ढोढ़ी टोते हूए जवाब देते हें कि अरे बिहार में नहीं न रहती हैं. तब उनसे लगे हाथ पूछा हूं कि बिहार में पटना से सटे आरा में ही तो पूनम सिंह रहती हैं, मशहूर रंगकर्मी, उनकी रचनाधर्मिता में भी तो कभी रुचि लेते नहीं देखा. और भी ऐसे ही कई नामों को बताकर पूछा हूं. जवाब नहीं देते. उन्हें कौन बताये कि यह जरूरी नहीं कि कौन कहां रह रहा है? क्या कर रहा है, यह महत्वपूर्ण होता है. आखिर इसी आधार पर तो बिहार में हर कुछ माह पर बाहर से बुलाकर विशेषज्ञों के नायकत्व को उभारने की परंपरा भी बनी हुई है, यह अलग बात है कि बिहारियों का वह आकर्षण नॉन रेसिडेंट बिहारी पुरूष नायकों को लेकर ज्यादा है.

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