जब बिहार आया आम का वह खास फिरंगी दिवाना

भारत की पहचान और भारत की ओर से ही दुनिया को देन, फलों के राजा आम को लेकर जब बात चलती है तो महाभारत, रामायण, बौद्ध ग्रंथों से लेकर आइने अकबरी और बाबरनामा तक की चर्चा जरूर होती है.ह्वेनसांग,इब्नेबतूता से लेकर दूसरे मशहूर विदेशी लेखकों की चर्चा जरूर होती है. लेकिन इन सबके बीच आम के ऐसे फिरंगी विद्वान की चर्चा नहीं होती, जो पूरी दुनिया घूमने, 500 अलग—अलग वनस्पतियों की खोज करने के बाद भारत आया और आया तो फिर भारत में रहकर आम की दुनिया में रम गया. बिहार के दरभंगा में रहते हुए न उसने न सिर्फ आम की दर्जनों नयी वेरायटी विकसित की बल्कि आम पर एक मुकम्मल किताब भी लिखी. वह किताब छप न सकी, लेकिन वह मशहूर फिरंगी अध्येता और आम का खास चित्तेरा सवा सौ साल बाद भी दरभंगा और आसपास के लोगों के मानस में जीवंतता से रचा—बसा हुआ है


आम भारत का फल है, दुनिया को भारत की देन है, यह बात तो अनेकानेक प्रकार से साबित हो ही चुकी है. आम को लेकर दुनिया में दिवानगी किस तरह है, यह बात आते ही रहती है. अपने देश में रामायण,महाभारत से लेकर बुद्ध के काल तक आम की चर्चा है. दुनिया के आन मुल्क से आनेवाले आम पर किस तरह फिदा हुए, इसे बाबर के बाबरनामा में लिखे आम के प्रसंग से बताते हैं. ह्वेनसांग, इब्नेबतूता के लिखे का भी हवाला देकर बताते हैं. फजल के आइने अकबरी के जरिये भी. खुसरो से लेकर बाद में भारत के शायरों, कवियों, लेखकों ने आम पर क्या, किस—किस रूप में लिखा, यह बात भी चलते रहती है. इस कड़ी में आम पर एक और आदमी का खास काम था लेकिन उसे हम याद नहीं करते. वह एक असाधारण फिरंगी थे, जो यूरोप से निकलकर पौधों की तलाश में पूरी दुनिया घूमे, 500 से अधिक वनस्पतियों की खोज की और फिर आखिर में भारत आकर आम की दुनिया में रम गये. और रमे भी तो ऐसे—वैसे नहीं, आम से एकाकार होकर जीवन ही भारत में गुजार दिये. और आम की दुनिया में भारत को, बिहार को उन्होंने जो दिया, वह आज भी निशानी के रूप में मौजूद है. वह फिरंगी विद्वान कोई और नहीं जर्मन वनस्पतिशास्त्री चार्ल्स मैरिस थे. वही मैरिस, जो वनस्पतिशास्त्र के क्षेत्र में अपने काम की वजह से लिनन सोसायटी के फेलो बने. जिन्हें अपने काम की वजह से विक्टोरिया मेडल आफ आनर भी मिला था. जो ब्रिटेन की महारानी के गार्डन के प्रमुख बन गये थे.

मूल रूप से यार्कशायर में एक मोची पिता के संतान के रूप में जन्में चार्ल्स मैरिस के दुनिया के मशहूर वनस्पतिशास्त्री बनने का प्रसंग बहुत रोचक है. लेकिन फिलहाल यहां चर्चा इस बात की कि दुनिया के कई देशों में घूमने के बाद मैरिस 1882 में भारत पहुंचे तो उन्होंने भारत को क्या दिया. और उसमें भी भारत की पहचान वाले फल आम की दुनिया में क्या दिया? मैरिस 1882 से 1898 तक दरभंगा में रहे. यानी उस समय के दरभंगा नरेश महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु तक. महाराजा की मृत्यु के बाद मैरिस ग्वालियर चले गये. वहां राजा के यहां चीफ गार्डन सुपरिटेंडेंट बन गये. दरभंगा में रहते हुए मैरिस ने महाराजा के साथ मिलकर आनंदबाग की प्लानिंग की. उस बाग में चंदन,रूद्राक्ष जैसे पेड़ों की कई वेरायटियां लगी. सैकड़ों किस्म के फुल. यह सब तो वे किये ही लेकिन इन सबके साथ मैरिस का एक अहम काम रहा आम के वेरायटी को विकसित करना. मैरिस ने महाराजा के नाम पर लक्ष्मेश्वर भोग विकसित किया. फिर शाह पसंद, सुंदर पसंद, दुर्गा भोज जैसी करीब 40 अलग—अलग खास वेरायटियां.दरभंगा राज में मैरिस सुपरिटेंडेंट के तौर पर जुड़े थे.

मैरिस ने यह सब करते हुए भारत में आम की दुनिया पर एक और खास काम किया था. एक किताब तैयार की थी. उसका नाम था— कल्टिवेटेड मैंगोज आफ इंडिया. वह किताब छप न सकी. इस किताब में मैरिस ने भारत के सौ से अधिक आमों के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी. सुंदर रेखाचित्रों के साथ. जानकार बताते हैं कि वह किताब अब भी लंदन के रॉयल बोटनिकल गार्डन के आर्काइव में सुरक्षित है.

भारत में आम की दुनिया पर जब बात चलती है,तो भले हम मैरिस को याद नहीं करते लेकिन दरभंगावाले अब भी उन्हें उतना ही याद रखते हैं. दरभंगा का तो यूं भी आम से बहुत पुराना और खास लगाव रहा है. आइने अकबरी में भी दरभंगा के आम बगीचे की चर्चा है. उसमें दर्ज है कि मुगल बादशाह अकबर ने दरभंगा में आम के एक लाख पेड़ लगवाये थे, जिसे लखिया बाग कहा जाता था. वह लखिया बाग अब दरभंगा में साधु बाग हो गया है.आम के पौधे अब वहां नहीं मिलते. आम भले ही खत्म हो गये हो वहां, चार्ल्स मैरिस के भी दरभंगा से गये भले करीब सवा सौ साल हो गये हों लेकिन दरभंगा और आसपास के इलाके में पीढ़ियों से आम लगाव,जुड़ाव,मोह,मोहब्बत ऐसा है कि आम लोकमानस में आम के ऐसे पुराने किस्से और मैरिस जैसे नायक जीवंतता के साथ मौजूद हैं. कहानियों के रूप में ही सही.

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Quote of the day- “The Man Who Has Confidence In Himself Gains The Confidence Of Others.” 
– Hasidic Proverb

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