लौंडानाच से बनाई पहचान, बिहार की मिट्टी से राष्ट्रपति भवन का सफर - रामचन्द्र मांझी

लौंडानाच से बनाई पहचान, बिहार की मिट्टी से राष्ट्रपति भवन का सफर – रामचन्द्र मांझी

Ramchandra Manjhi

 कौन हैं कलाकार रामचन्द्र मांझी?

बिहार के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के शिष्य हैं रामचंद्र मांझी जिन्हे बिहार सरकार ने लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से पुरस्कृत किया है और इस साल उन्हे पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है ।

रामचंद्र मांझी का जन्म 1925 में बिहार के छपरा जिले में हुए था , वो एक प्रसिद्ध लोक कलाकार हैं। वह ‘लौंडा नृत्य’ के प्रसिद्ध नर्तक हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 2017 से नवाजा जा चुका है। रामचंद्र मांझी 90 वर्ष से ऊपर की आयु होने के बाद भी आज मंच पर जमकर थिरकते और अभिनय करते हैं। यह बिहार ही नहीं बल्कि बिहार से बाहर व विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन करते आएं हैं।

० दस साल की उम्र से ही मंच पे करते आए हैं कलाकारी।

उन्होंने 10 साल की उम्र में ही गुरु भिखारी ठाकुर के साथ स्टेज पर पांव रख दिया था। इसके बाद वह 1971 तक भिखारी ठाकुर की छाया तले ही कला का प्रदर्शन करते रहे।‘भोजपुरी के शेक्सपीयर’ के निधन के बाद भी रामचंद्र मांझी ने लौंडा नाच की परंपरा को बनाए रखा और गौरीशंकर ठाकुर, शत्रुघ्न ठाकुर, दिनकर ठाकुर, रामदास राही और प्रभुनाथ ठाकुर के नेतृत्व में काम किया।

० लौंडा नाच से बनाई अपनी पहचान ।

लौंडा नृत्य’ बिहार के प्राचीन लोक नृत्यों में से एक है। इसमें लड़का, लड़की की तरह मेकअप और कपड़े पहन कर नृत्य करता है। किसी भी शुभ मौके पर लोग अपने यहां ऐसे आयोजन कराते हैं हालांकि, आज समाज में लौंडा नृत्य हाशिए पर है। अब गिने-चुने ही लौंडा नृत्य मंडलियां बची हैं, जो इस विधा को जिंदा रखे हुए है, लेकिन उनका भी हाल खस्ता ही है क्योंकि आज लोग सिर्फ आइटम सॉन्ग्स को ही देखना पसंद करते एक आदर्श नृत्य के असली रूप को नही देख पाते। रामचंद्र मांझी ने अपने इस हुनर को आज तक संजोक कर रखा है। 

० नाच भिखारी नाच से पद्मश्री का सफर रहा सबसे मज़ेदार।

रामचंद्र मांझी ने भिखारी ठाकुर के साथ एक सबसे चर्चित नाटक किया था जो 72 मिनट का था जिसका नाम था “नाच भिखारी नाच” जिसके बारे में यह चर्चा थी कि इस नाटक को देखते हुए लोग इतने मशगूल हो जाती थे की कुएं में गिर जाते थे और इसे नाटक को  देखने के लिए  लोग 3 4 कोश दूर से आते थे। भिखारी ठाकुर और उनकी मंडली आज भी उतनी ही प्रशंशित होती हैं जितनी वो अपने शुरुआती दिनों में हुया करतीं थीं। भले आज लौंडा नाच की परंपरा विलुप्त होती जा रही है , लेकिन इसके कलाकार आज भी पूरी उत्साह और उमंग के साथ अपने कर्तव्य का पालन करते हैं और लौंडा नाच को आज बढ़ा रहे हैं।

० पद्मश्री से नवाज़े जाने के बाद मांझी की बढ़ी उम्मीदें।

रामचंद्र मांझी को उनकी कला तथा योगदान हेतु ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया है। जीवन के इस पड़ाव पर ‘पद्मश्री’ मिलने के बाद रामचंद्र को उम्मीद है कि अब लौंडा नृत्य की कला में फिर से नई जान  आएगी। पद्मश्री पुरस्कार मिलने के बाद मांझी की खुशी का ठिकाना न रहा  मीडिया से बातचीत करते हुए रामचन्द्र मांझी ने भोजपुरी में कहा कि ‘हम कबो सपनों में भी ना सोचले रहनी कि हमारा कबो एह सब तरह के सम्मान आ पुरस्कार भी मिली’.इसके साथ साथ उन्होंने  कहा कि अब उनका जीवन धन्य हो गया और वे भी भिखारी ठाकुर की वजह से अब लोगों के दिलों में आजीवन जिंदा रहेंगे.

० बिहार के दो दलितों को पद्मश्री से किया गया सम्मानित

पिछले साल जिन लोगों को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया उनमें बिहार के दो दलित कलाकार रामचंद्र मांझी और दुलारी देवी भी शामिल हैं। मांझी जहां ‘नाच’ कलाकार हैं वहीं दुलारी देवी मिथिला चित्रकार हैं। मांझी और दुलारी को राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंचने के लिए काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ा। और इंसान के बीच गौरतलब ये हैं की इन्हे पुरस्कार इनके काबिलियत के दाम पे मिली है और दोनो दलित समुदाय से भी आते हैं, इससे न केवल इनके क्षेत्र के कलाकारों को ही बाल मिलेगा बल्कि दलित समुदाय से आने वाले लोग भी  शशक्त होंगे ।

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