मधुबनी पेंटिंग को विदेशों में भी प्रख्याती दिलाने वाली- गोदावरी दत्ता

मिलिए बिहार की रहने वाली 93 साल की गोदावरी दत्ता से….जिन्हें मिथिला पेंटिंग की शिल्पगुरु माना जाता है। 93 साल की गोदावरी दत्ता बिहार के मधुबनी जिले में रहती हैं और उन्होंने मिथिला पेंटिग को एक संभाग से निकालकर देश-दुनिया में पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। वो बीते पांच दशक से मिथिला पेंटिंग पर काम कर रही हैं और उनके बनाए चित्रों को देख कर लोग बरबस ही दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। इतना ही नहीं लोग उनसे पेंटिंग्स के गुर सीखने के लिए भी आते हैं। अब तक वो लगभग 49000 लोगों को मधुबनी पेंटिंग सिखा चुकी हैं। दत्ता की पेंटिंग्स को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी प्राप्त है जापान के मिथिला म्यूजियम में भी उनकी कृतियों को लगाया गया है। गोदावरी दत्ता को मिथिला पेंटिंग में लगातार उत्कृष्ट काम के लिए भारत सरकार की ओर से साल 2019 में 90 वर्ष की आयु में उन्हें पद्मश्री अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। इसके अलावा भी उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।

उनका जन्म दरभंगा (बिहार) के बहादुरपुर गांव में 1930 में निम्न वर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ। पांच वर्ष की हुई तो वो अपनी मां सुभद्रादेवी को दीवारों पर कुछ बनाते देखती रहती थी। वो उनसे पूछती थी कि आप क्या बनाती हो तो उनकी मां हंसकर टाल देती थीं। फिर एक दिन उन्होंने उन्हें बताया कि यह मधुबनी कला है। इसमें देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं। कोई भी शुभ काम इन चित्रों को बनाए बगैर संपन्न नहीं होते। मां को देख उनका मन भी इसमें रमने लगा। वे उस जमाने की चर्चित चित्रकार थीं। मां ने इस कला की हर बारीकी उन्हें सिखाई। चित्र बिकते थे तो पैसे आते थे और उससे उनके परिवार का खर्च चलता था। उन दिनों (शादी के पहले) ए ग्रेड की पेंटिंग को 10 रुपए, बी को 7 और सी ग्रेड की पेंटिंग को 5 रुपए मिलते थे।

पहली बार उनकी पेंटिंग को एक अमेरिकी ने 25 रुपए में खरीदी थी। पैसे आते देख वो इस कला में वो रच-बस गई। अभी उन्होंने होश संभाला ही था कि उनके पिता रासबिहारी की मृत्यु हो गई। वो कक्षा 9वीं तक पढ़ी थी, जो उस वक्त के लिए बहुत काफी था। मां ने खूब संघर्ष के साथ अकेले ही उनका पालन- पोषण किया। और 16 बरस की उम्र में हि उनका विवाह रांटी गांव के उपेंद्र दत्त से कर दिया।

विवाह होने तक वह चित्रकारी की कला में पारंगत हो चुकी थी। लेकिन ससुराल आकर उनकी कला ठहर-सी गई। इस बीच वह एक बेटे की मां बनी। वो चित्रकारी करने के लिए छटपटाती रहती थी, लेकिन ससुराल में किसी को उनका चित्र बनाना पसंद नहीं था। उस जमाने में घूंघट में रहने वाली महिलाएं दहलीज के बाहर तक नहीं निकल पाती थीं तो उन्हें बाहर जाकर चित्रकारी करने की अनुमति कैसे मिल पाती? इस वजह से अपने पति के साथ उनके मतभेद और मनभेद बढ़ते चले गए। मतभेद इतने बढ़े कि वो चार वर्ष के बेटे हेमचंद्र को लेकर पति से अलग हो गईं और अपनी कला यात्रा फिर शुरू कर दी। पति इतने नाराज हो गए कि उन्हें छोड़कर दिल्ली चले गए, दूसरी शादी कर ली और कभी नहीं लौटे। लेकिन, उनकी कला को देखकर कुछ समय बाद ससुराल वाले सपोर्ट करने लगे। ससुराल वालों ने न सिर्फ उन्हें साथ रखा बल्कि उनकी जरूरतों का भी पूरा ख्याल रखा। जो भी उनकी मधुबनी पेंटिंग्स देखता, तारीफ करता। वो लोगों के घर जाकर भी कई मौकों पर इसे बनाती थी। उनकी पेंटिंग्स काफी पसंद की जाने लगी। लोग आग्रह करने लगे कि वो उन्हें भी सिखाएं। उन्हें जितना आनंद मधुबनी पेंटिंग बनाने में आता था, उतना ही अन्य महिलाओं को सिखाने में आने लगा। इस कला पर जल्दी ही किसी का हाथ सेट नहीं होता, बारीकी सीखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

उनकी पेंटिंग्स के साथ ही उनकी सिखाने की चर्चा भी जगभर में फैलने लगी। बिहार में शिल्प के लिए राज्य सरकार ने 1973 में उन्हें सम्मानित किया। जब नीलम संजीव रेड्‌डी प्रेसिडेंट बने तो उन्होंने भी उनका सम्मान किया। अपने राज्य और देश में जो प्यार मिलने लगा, उससे उनका जोश बढ़ता गया। समुद्र मंथन, त्रिशूल, कोहबर कृष्ण, डमरू, चक्र, बासुकीनाग, अर्द्धनारीश्वर और बोधि वृक्ष की पेंटिंग ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।

मधुबनी कला में उनके अस्मरणीय योगदान के लिए उन्हें भारत की ओर से इस कला को जर्मनी, अमेरिका सहित दुनिया के 12 देशों में पहचान दिलाने के लिए उन्हें चुना गया। इन विदेश यात्राओं में जापान में बना मधुबनी म्यूजियम सबसे खास है। टोकियो के हासिगावा ने अनुरोध किया कि वो उनके म्यूजियम के लिए पेंटिंग बनाएं। वह छह महीने तक वहां एग्जीबिशन के लिए पेंटिंग बनाती रहीं। इस काम के लिए उन्हें कोई पैसा नहीं मिला, लेकिन वहां की सरकार के पुरस्कार और लोगों के प्यार ने सारी कमी पूरी कर दी। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, मद्रास, हैदराबाद सहित तमाम शहरों में उनकी कला सराही गई। देश-विदेश में उनके चित्रों की अनगिनत प्रदर्शनियां लग चुकीं हैं। पहली प्रदर्शनी जर्मनी में 1985 में 17 दिन की लगी थी। 1989 से 1995 के बीच मधुुबनी पेंटिंग के लिए उन्होंने सात बार जापान की यात्रा की।

उनकी कला ने एक मुकाम हासिल कर लिया है। जिन लोगों को उन्होंने मधुबनी पेंटिंग्स बनाना सिखाया, उनके लिए रोजगार के नए दरवाजे खुलने लगे। उनका शौक में सीखा एक हुनर उनके द्वारा सिखाई हुई हजारों महिलाओं के लिए पैसा कमाने का जरिया बना हुआ है। गोदावरी के हिसाब से सीखने की शुरुआत उस दिन से ही शुरू हो जाती है जब कोई सीखने की ठान लेता है। मैंने अपनी चारों पोतियों को भी मिथिला कला में निपुण कर दिया है

Malda Aam

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