बिहार के इस 47 वर्षीय स्कूली शिक्षक ने तमाम बाधाओं के बावजूद भारत को 70 चैंपियन दिए

आज के समय में जहां दुनिया भले ही आगे बढ़ चुकी हो, लेकिन फिर भी कई सारी ऐसे घर है, कई ऐसे गांव है कई सारे ऐसे जिले हैं जहां पर लड़कियों को अभी भी न खुशी-खुशी स्वीकार आ जाता है और ना ही उन्हें अच्छी जिंदगी दी जाती है।
भारत में आज भी कई ऐसे घर है जहां पर बच्चियों के पैदा होते ही घर में मातम का माहौल बन जाता है।आज भी बेटियों को ना सही इज्जत मिल पाती है, ना सही शिक्षा और ना ही सही देखभाल और प्यार।

कुछ ऐसी ही परेशानियों से जूझ रही बिहार राज्य सिवान के लक्ष्मीपुर गांव की 55 लड़कियां। पुरानी अवधारणाओं को तोड़ते हुए यह लड़कियां रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्टस एकेडमी में ज्योग्राफी टीचर और कोच संजय पाठक के द्वारा स्पोर्टस की ट्रेनिंग ले रही है।

जिस तरह से इन बच्चियों को आगे बढ़ने के लिए लड़ना पड़ रहा है। कुछ ऐसे ही 47 साल के सरकारी स्कूल टीचर ने भी एक लड़ाई लड़ी है।
संजय पाठक आज इन बच्चियों को फ्री में ट्रेनिंग दे रहे है,साथ ही आपको बता दें कि अब तक इन्होंने बीते 10 साल में 70 नेशनल और इंटरनेशनल फुटबॉल,हैंडबॉल,एथलीट और अन्य स्पोर्ट के प्लेयर को तैयार किया है।

संजय पाठक भले फॉर्मल कोच नहीं थे, लेकिन अपने पैशन को आगे बढ़ाते हुए इन्होंने कई सारे उभरते सितारों को तैयार किया है। उन्होंने अपने कोच की जर्नी 2009 में शुरू की,जब उनकी पोस्टिंग आदर्श गवर्नमेंट मिडिल स्कूल मे हुई।

संजय बताते हैं कि 2009 में दो लड़कियां तारा और पुतुल खातून लोकल टूर्नामेंट स्पोर्ट्स में भाग लेना चाहती थी और इसीलिए इन दोनों लड़कियों ने उन्हें मनाते हुए उन्हें स्पोर्ट्स के कॉम्पीटिशन के लिए रजिस्टर करने के लिए तैयार करवाया। फिर उन्होंने उन दोनों बच्चियो को तैयार किया, इस कंपटीशन में पार्टिसिपेट होने के लिए। सबसे ज्यादा हैरानी उन्हे तब हुई जब वह दोनों ही बच्चिया इस कॉम्पीटिशन में गोल्ड मेडल जीतकर आई।
जिसके बाद तारा और पुतुल, दोनों ही डिस्टिक लेवल और स्टेट लेवल पर आयोजित होने वाले कई सारे प्रतियोगिताओं में हिस्सा ली, तो साथ ही उन्होंने पंचायत युवा खेल अभियान में भी हिस्सा लिया और जीत हासिल करते हुए गोल्ड, सिल्वर ब्रोंज जैसे मेडल जीत कर लाई।

इन दोनों बच्चियो के जीत के बाद संजय स्पोर्ट्स का प्रशिक्षण देने के सोच में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि जब यह दोनों बच्चियां इतना अच्छा परफॉर्मेंस दे सकती है तो अगर वह अपनी कोचिंग को खोलकर ऐसे ही गांव की और भी बच्चियों को इस लायक बनाये और स्पोर्ट्स के लिए तैयार करे तो। इसके बाद उन्होंने स्कूल का समय समाप्त होने के बाद बच्चियों को सपोर्ट के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।

संजय ने स्कूल समाप्त होने के बाद स्कूल के ग्राउंड में ही बच्चियों को ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया। तारा और पुतुल को देखते हुए कई सारी लड़कियां उनसे इंस्पायर्ड थी और ऐसी बच्चियों ने संजय के ट्रेनिंग क्लासेस को ज्वाइन कर लिया। कुछ महीनों में ही गांव की लगभग 100 लड़कियां फुटबॉल, रग्बी,हैंडबॉल और एथलीट की ट्रेनिंग के लिए संजय सर के पास आने लगी।
फुटबॉल का ट्रेनिंग देने के लिए संजय ने यूट्यूब का सहारा लिया और साथ ही और भी ऑनलाइन मीडिया का, जिससे उन्होंने फुटबॉल सीखा और फिर उन्होंने बच्चों तैयार करना शुरू कर दिया, सभी बच्चिया काफी स्ट्रेंथ से भरी हुई थी और काफी पोटेंशियल था। उनका पोटेंशियल फील्ड पर दिख रहा था,अगर कहीं कमी थी तो वह थी सही प्रशिक्षण की। जिसके बाद उन्होंने इन बच्चियों को ग्रूम करना शुरू किया।
संजय बताते हैं कि वह खुद भी स्पोर्ट्स पर्सन नहीं थे, पर उन्होंने 2009 में एक गर्ल्स फुटबॉल टीम तैयार की और इन बच्चों की टीम को डिस्टिक ऑaल स्टेट लेवल पर कंपटीशन में उतारना शुरू किया जिससे इन्हें पहचान मिली।

इन्हीं लड़कियों में से एक थी अमृता कुमारी जिसने अंडर फोर्टिन कैटेगरी में फ्रांस और श्रीलंका में 2013 में फुटबॉल खेला और क्वालीफाई करते हुए अंडर 16 नेशनल टीम तक पहुंच गई।
ऐसे ही निशा कुमारी भी 2015 में नेशनल के लिए फुटबॉल खेलते हुए अंडर 14 टीम में सेलेक्ट हुई।

फुटबॉल के साथ-साथ संजय ने हैंडबॉल, एथलीट के लिए भी टीम तैयार करना शुरू किया।जिसमें की एक लड़की उषा कुमारी ने 400 मीटर्स के दौर मे हरिद्वार मे 2015 सिल्वर जीता।
ऐसे ही खिलाड़ियों की लिस्ट तैयार होना शुरू हो गई।और फिर कुछ प्लेयर्स ने इंडिया को नेपाल में रिप्रेजेंट किया नेपाल के साथ साथ तजिकस्तान में बेरुत, लेबनान और कई नेशनल स्पोर्ट्स कंपटीशन में भारत को रिप्रेजेंट किया।

जिसके बाद जनवरी 2019 में संजय ने एक ट्रस्ट की स्थापना की और डोनेशन के लिए लोगों से आगे आने को कहा.गांव में काफी अपोजिशन फेश करने के कारण इर्द-गिर्द के लोगों और परिवार के लोगों द्वारा उन्होंने फाइनेंशियल सपोर्ट की उम्मीद नहीं की। संजय बताते हैं कि उन्होंने अपनी सैलरी का इस्तेमाल करते हुए बच्चियों के खाने-पीने और रहने का खर्च उठाया साथ ही उसी सैलरी से बच्चियों के लिए जूते, फुटबॉल और जरूरी सामान लिया।
संजय बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपनी पत्नी से अपने सोने के झुमके गिरवी रखने तक को कहें ताकि उस झुमके से आने वाले 35000 पैसों का इस्तेमाल वह बच्चों के लिए लिये जाने वाले सभी एक्सपेंसेस में कर सकें। उनके परिवार वाले उनसे कहते थे कि अगर वह इस तरह से देश के लिए सब कुछ निछावर करते रहेंगे तो उनका परिवार कैसे चलेगा।

लेकिन उन सभी को एक भरोसे कीI उम्मीद तब लगी जब डोनेशन के तौर पर लोगों ने संजय का साथ देना शुरू किया और बाहर से लोग ने डोनेशन कर मदद करना शुरू किया। जिससे कि संजय फुटबॉल, शूज और कई सारे सामानों को ला सकते थे। सिर्फ भारत ही नहीं यूके,नीदरलैंड और यूएस से भी लोगों ने डोनेशन किया।

इन सभी अचीवमेंट के बाद संजय और उन सभी लड़कियों ने ऐसे ही कम्युनिटी के लोगों को आगे बढ़ाने का सोचा जो इस तरीके की चीजों को फेस कर रही है।
संजय कहते हैं कि कई सारे ऐसे लोग हैं जो मुझसे सवाल करते थे कि आखिर में सिर्फ लड़कियों को ही कोचिंग क्यों देता हु?क्यों मैं लड़कियों को लड़के वाले कपड़े पहन आता हूं? इतना ही नहीं गांव के कल्चर को मानते हुए बच्चियों को स्पोर्ट्स में करियर बनाने से भी रोका गया।
गांव के लोग मेरे इस काम को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। लड़कियों के टीशर्ट और शर्ट पहने पर उनके कैरेक्टर पर सवाल उठने शुरू हो गए।
संजय बताते हैं कि लोगो को बच्चियों का मेहनत नहीं दिख रहा था किसी को बच्चियों का पसीना बहता नहीं दिख रहा था,कोई भी उन बच्चियों को खुलकर जीने की आजादी नहीं देना चाहता था।
जब यह बच्चियां निकलती थी तो गांव के नौजवान इनको देखकर घटिया गाने गाते थे,उन्हें परेशान करते थे।
इतना ही नहीं स्कूल के प्ले ग्राउंड में काँच के बोतल को तोड़कर बिछा दिया जाता था ताकि बच्चियों को परेशानी हों।
इन सभी चीजों को देखते हुए इन सभी खिलाड़ियों के सेफ्टी को देखते हुए संजय ने सभी प्लेयरस के परिवार वालों से 2 एकड़ की जमीन मांगी ताकि वह इन सभी बच्चियों को वहां पर ट्रेनिंग दे सके और उस जमीन पर फुटबॉल ग्राउंड बना सके उन बच्चियों को रखने की सुविधा दे सकें।
2020 में एक बिल्डिंग तैयार हुई जिसमें 30 बच्चियों की रहने की सुविधा है और सभी फैसिलिटी है। जिसका नाम रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकैडमी रखा गया।

संजय बताते हैं कि वह कोई लग्जरी लाइफ़स्टाइल इन बच्चियों को नहीं रह सकते।लेकिन कुछ नहीं होने से अच्छा है कुछ होना,सभी खिलाड़ियों के खाने पर वह एक खिलाड़ी पर 100 रूपये का खर्च कर सकते थे लेकिन सरकार के द्वारा जो डाइट जारी किया गया था जैसे कि अंडा, मुर्गा,दाल,दलिया और काफी सारे प्रोटीन वाले खाने,इन सभी में एक खिलाड़ी पर 225 लगते थे।

Malda Aam

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