बिहार की प्राचीनतम कला- पपीयर माचे

बिहार की प्राचीनतम कला- पपीयर माचे

बिहार भारत के प्राचीनतम शहरों में से एक है। पौराणिक काल से ही बिहार अपनी सभ्यता और संस्कृति को लेकर चर्चा का विषय रहा है। इसी सांस्कृतिक राज्य बिहार में मुगल काल से ही पपीयर माचे नाम की एक शिल्प कला बनाई जाती है। विदेशों में भी बेहद प्रसिद्ध है। बेशक समय के साथ इस शिल्प कला ने अपना स्वरूप बदला है लेकिन अपना महत्त्व और आकर्षण नहीं खोया है। तो आज हम इस आर्टिकल में पपीयर माचे शिल्प कला के बारे में जानेंगे।

पपीयर माचे एक फ्रांसिसी शब्द है जिसका अर्थ है- मसले तथा कटे हुए कागज़। ऐसा माना जाता है कि इस शिल्प कला की खोज सबसे पहले चीन में हुई थी। पपीयर माचे बिहार का एक प्राचीनतम शिल्प है जिसका उपयोग विभिन्न नृत्य रूपों के मुखौटे तैयार करने के लिए किया जाता था। इसकी निर्माण सामग्री बेकार पेपर के गूदे से बनती है। अखबार या बेकार पेपर, मुल्तानी मिट्टी, मेथी पाउडर (जो सुगंध के साथ-साथ कीड़ों से सुरक्षा देते हैं) को पानी और गेहूं के आटे के गोंद से चिपकाकर पेपर माचे शिल्प बनाया जाता है। यह अनूठा शिल्प मुगल काल के दौरान विकसित हुआ और अब भी बड़ी संख्या में कारीगरों द्वारा इसका अभ्यास किया जा रहा है। मुगलों के समय में इनसे कई वस्तुएं बनाई गयीं तथा वस्तुओं की सतह को पारंपरिक लघु शैली में रंगा गया। यह शिल्प-कला पर्यावरण हितैषी ( इको- फ्रेंडली) होने के साथ-साथ रीसाइकिलेबल भी है।

पपीयर माचे शिल्प बनाने की विधि-

सबसे पहले, सूखे पेपर को लगभग 1 सप्ताह के लिए पानी में भिगोया जाता है। पानी में पेपर के टुकड़े होने के बाद इसे खल- मसूल में कुचल दिया जाता है या हथौड़े से पीटकर पेस्ट बना लिया जाता है। फिर, मुल्तानी मिट्टी को लगभग 24 घंटे के लिए पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद पेपर, मुल्तानी मिट्टी, मेथी पाउडर और गोंद के साथ मिलाकर विभिन्न तरह के आकार बनाए जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया हाथ से की जाती है और अंत में बनी हुई आकृतियों को सुखाया जाता है फिर उन्हें बेहद आकर्षक रूप देने के लिए विभिन्न रंगों से सजाया जाता है। इसकी रूपरेखा आमतौर पर एक ज़र्दा या पीले रंग के साथ खींची जाती है और रिक्त स्थान में फूलों के डिज़ाईन बनाये जाते हैं। फिर फूलों के कार्यों को विभिन्न रंगों में रंगा जाता है।

वर्तमान में पपीयर माचे का उपयोग घरेलू उपयोगितावादी सामान को बनाने के लिए किया जाता है। इससे कई वस्तुओं जैसे ट्रे (Tray), बॉक्स (Box), बुक कवर (Book Cover), लैंप (Lamp), पेन केस (Pen Case), खिलौने, फूलदान आदि आज तक बनाए जाते हैं। शिल्पकार पपीयर माचे के पारंपरिक मुखौटे बनाते हैं जिनका उपयोग छऊ नृत्य में किया जाता है। अन्य पपीयर माचे उत्पाद में पशु और पक्षी के मुखौटे भी बनाए जाते हैं। स्थानीय त्यौहारों में भी खिलौने बनाने के लिए पपीयर माचे का उपयोग उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर किया जाता है। उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान, पटना के संग्रहालय में है पपीयर माचे शिल्प का विशाल संग्रह है। ये संस्थान छात्रों और कलाकारों को पपीयर माचे का प्रशिक्षण भी देता है।

पपीयर माचे भारत का सदियों पुराना शिल्प है। पटना, मुर्हू, हजारीबाग, मधुबनी और सरायकेला बिहार और झारखंड में पपीयर माचे के शिल्प अभ्यास केंद्र हैं।

मुगल काल में इस कला को पालकी, छतों, दरवाज़ों और खिड़कियों पर बनाया गया था। इस कला के सुंदर नमूने यूरोप और अमेरिका के संग्रहालयों में भी देखे जा सकते हैं। पुराने दिनों में इसे कलात्मक रूप से लकड़ी, विशेष रूप से खिड़कियों, दीवारों, छतों और फर्नीचरों (Furniture) पर बनाया गया था। पपीयर माचे के निर्माण को दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। एक है सख्तसाज़ी (वस्तु बनाना) और दूसरा नक्काशी (सतह को चित्रित करना)।


सख्तसाज़ी में बेकार कागज़, कपड़ा, चावल के भूसे और तांबा सल्फेट (Sulphate) को एक साथ मिलाकर लुगदी बनायी जाती है। लुगदी तैयार होने के बाद, इसे आवश्यक आकार देने के लिए लकड़ी या पीतल के सांचों पर उपयोग किया जाता है। जब लुगदी सूख जाती है, तो इसे एक समान सतह के साथ पत्थर की मदद से घिसकर चिकना किया जाता है। इसे मज़बूत बनाने के लिए इसके ऊपर गोंद का उपयोग किया जाता है। जिसके बाद इसे कठवा नामक लकड़ी से धीरे से रगड़ा जाता है। ब्रश (Brush) की मदद से वस्तु के अंदर व बाहर गोंद और चाक का मिश्रण लगाया जाता है। अब कागज़ के छोटे टुकड़ों को गोंद की मदद से उस पर चिपकाया जाता है।

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