बिहार की परम्परा से जुड़ी नायाब कलाओं में से एक : सिक्की कला

 

बिहार में अनेक कला और अनेक ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है। कई कलाएं ऐसी हैं जिनकी शुरुआत बिहार से ही हुई और पहले की तरह इसे आज भी लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है। ऐसी ही एक बहुत पुरानी कला है सिक्की कला जिसकी शुरुआत बिहार से ही हुई थी और फिर कहीं गुम हो गई, लेकिन आज फिर से लोगों को सिक्की कला की जानकारी मिलने लगी है। घरों को कला से सजाया जा रहा है।

 

सिक्की आर्ट बिहार का एक बहुत ही पुराना आर्ट है। सिक्की घास से कई चीजें बनाई जाती थी। पहले बने बनाई चीजें हमें नहीं मिलती थी, तो अपनी सुविधा अनुसार लोग ऐसी चीजें खुद ही बना लेते थें। ऐसे ही घरेलू चीजें जैसे दाल चावल को रखने के लिए सिक्की घास का उपयोग किया गया। इससे औरतों ने अपनी जरूरतों की चीजों को रखने के लिए ऐसे डब्बे बना डालें। इसके अलावा सिक्की घास से छोटे डब्बे बनाए जाने लगे जिसमें की सिंदूर, आभूषण जैसी चीजें रखी जाने लगी। उस वक़्त इन आर्ट्स को जानना लड़कियों के लिए अहम माना जाता था। शादी के लिए यह एक जरूरी चीज़े थी। शादी के दौरान इन्हीं सिक्की घास से बने चीज जैसे पौथी, दपुरा, दलिया , मौनी, चट्टी, दिए जाते थें।

 

सिक्की आर्ट के लिए सिक्की घास सबसे जरूरी चीजों में से एक है। बरसात के दिनों में सिक्की घास को इकट्ठा किया जाता है। इसके अलावा मुंज और खरा जैसी चीजों  भी सिक्की आर्ट से समान बनाने के लिए जरूरी है। सिक्की को सुखाने बाद इसे रंग कर अलग अलग प्रकार की चीजें बनाई जाती है।

 

वक़्त के साथ ही  आर्ट धीरे धीरे ख़तम हो चुका था क्योंकि सिक्की घास से बनी चीजें की जगह प्लास्टिक या स्टील से बनी चीजों ने ले ली थी। इंडस्ट्री से बनी चीजों का समय अा चुका था तो लोगों ने हांथ से बनी चीजों की जगह इंडस्ट्री में बनी चीजों को तवाज्जो देना शुरू कर दिया और सिक्की आर्ट जैसे कई आर्ट्स ख़तम हो गए।

 

लेकिन  अब फिर से ये आर्ट्स दिखने को मिलने लगे हैं। क्योंकि को ऐसे आर्ट्स पसंद आने लगे हैं। उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान ने 2013-14 में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन। के साथ मिल कर एक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया था जिसमें लोगों को आर्ट  से नए डिजाइन बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। अब ऐसे आर्ट्स लोगों के घरों में ज्यादा देखने को मिलते हैं। सिक्की घास से बने चीजों से ,लोग घरों को सजाने लगे हैं।

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