बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा, जिन्होंने अपनी लेखनी से दी बिहार को नई पहचान।

बिहार के लेखकों के बारे में जब भी चर्चा होती है तो हमें सिर्फ कुछ गिने चुने नाम ही याद आते हैं, जैसे – आचार्य शिवपूजन सहाय, दिवाकर प्रसाद विद्यार्थी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, राम बक्षी बेनीपुरी, फणीश्वर नाथ ‘ रेणु’, गोपाल सिंह “नेपाली”, रमेश चंद्र और भी बहुत सारे है, सब के नाम गिनने बैठे तो आप सब नाम ही पढ़ते थक जाएंगे । लेकिन बिहार में कई सारे ऐसे लेखक है जिनकी शानदार लेखनी के साथ ही बिहार के प्रति उनका समर्पण भी सराहनीय है लेकिन उनके बारे में बहुत कम ही लोग जानते है। उनमें से एक है बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा जो कि बिहार राज्य के पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय के संस्थापक रहे। जिन्हें बी. पी. सिन्हा के नाम से जाना जाता है, साथ ही वो एक भारतीय पुरातत्वविद् और इतिहासकार रहे जो प्राचीन भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ थे।

सिन्हा पटना विश्वविद्यालय में इतिहास और पुरातत्व विभाग के एक प्रोफेसर और प्रमुख थे। इन सब के बावजूद बिहार राज्य के पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय के संस्थापक भी रहें।  वह पटना में के.पी. जयसवाल शोध संस्थान के निदेशक भी थे। और इन सब के साथ ही वह एक बहुत ही बेहतरीन लेखक भी हैं। उन्होंने कई सारी किताबें लिखीं हैं जैसे मगध का ऐतिहासिक इतिहास, सीर. 450-1200 ए.डी., रीडिंग इन हिस्ट्री एंड कल्चर, ट्विलाइट ऑफ़ दी इंपीरियल गुप्ता, नयनतारा सहगल के उपन्यासों में सामाजिक और राजनीतिक चिंता, बिहार का व्यापक इतिहास। उन्होंने 3 भाषाओं में 150 प्रकाशनों में 53 काम किया।

बी.पी. सिन्हा का बिहार से संबंध किस प्रकार है उसपे नज़र डाले तो उनका का जन्म 1919 में बिहार शरीफ में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से एम. ए. की उपाधि प्राप्त की।  उन्होंने एक पी.एच.डी. 1948 में एसओएएस, लंदन विश्वविद्यालय से किया। उनके गाइड लियोनेल बार्नेट थे, और उनकी थीसिस किंगडम ऑफ मगध के विषय पर थी।  भारत लौटने के बाद, उन्होंने पटना कॉलेज और बाद में पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाया।  वे 1958 में विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष और 1959 में प्रोफेसर बने। उन्होंने बुल्गारिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूगोस्लाविया में एक विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भी पढ़ाया।

सिन्हा को 8 वीं शताब्दी में स्थापित एक प्राचीन बौद्ध मठ के स्थल विक्रमशिला में पहली खुदाई करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने चिरांद में खुदाई भी की।सिन्हा अयोध्या विवाद के दौरान बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के साथ अपनी बातचीत में विश्व हिंदू परिषद का समर्थन करने के लिए अन्य विद्वानों और शिक्षाविदों में से थे।  उन्होंने एक दस्तावेज लिखा, जिसमें राम जन्मभूमि के रूप में अयोध्या के समर्थन में पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, जिसे विहिप ने बाद में दिसंबर 1990 में भारत सरकार को प्रस्तुत किया।

 

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