देश का एकमात्र पश्चिमोभिमुख सूर्य मंदिर: औरंगाबाद

देश का एकमात्र पश्चिमोभिमुख सूर्य मंदिर: औरंगाबाद

देश में सबसे प्राचीन शक्तिपीठों और ज्योतिर्लिंगों को माना जाता है। इन सभी का समय-समय पर जीर्णोद्धार किया गया। प्राचीनकाल में यक्ष, नाग, शिव, दुर्गा, भैरव, इंद्र और विष्णु की पूजा और प्रार्थना का प्रचलन था। बौद्ध और जैन काल के उत्थान के दौर में मंदिरों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा।

ऐसा ही एक आश्चर्य और रहस्यमयी मंदिर बिहार के औरंगाबाद जिले में है, जिसके बारे में लोग बताते हैं की इस मंदिर ने खुद ही अपनी दिशा बदल ली थी और यह मंदिर मुरादों का मंदिर कहा जाता है।

औरंगाबाद जिले के देव में एक रहस्मयी सूर्य मंदिर स्थापित है। इस मंदिर के बारे में लोगों का मानना है की यहां जो भी भक्त अपनी मुरादें लेकर आता है उसकी सभी मुरादें ज्लद पूरी हो जाती है। यह अद्भुत मंदिर अपने अंदर कई रहस्य समेटे हुए है। किवदंतियों के अनुसार इस मंदिर ने खुद ही अपनी दिशा बदल दी थी। इसके पीछे बहुत ही रोचक कहानी है।

पश्चिमोभिमुख सूर्य मंदिर का रहस्य।

एक बार औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता हुआ औरंगाबाद के देव पहुंचा। जब वह सूर्य मंदिर पहुंचा तो पुजारियों ने उससे मंदिरों को ना तोड़ने को लेकर बहुत विनती की, जिसके बाद उसने पुजारियों से कहा कि यदि सच में यहां भगवान हैं और इनमें शक्ति है तो इस मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम में हो जाए, अगर ऐसा हुआ तो में मंदिर को नहीं तोडूंगा।

औरंगजेब पुजारियों को मंदिर के प्रवेश द्वार की दिशा बदलने की बात कहकर अगली सुबह तक का वक्‍त देकर वहां से चला गया। जिसके बाद पुजारियों ने सूर्य देव से प्रार्थना कि और अगली सुबह पूजा के लिए पुजारी जब मंदिर पहुंचे तो उन्‍होंने देखा कि मंदिर का प्रवेश द्वार दूसरी दिशा यानी पश्चिम दिशा में था। बस तभी से सूर्य देव मंदिर का द्वार पश्चिम दिशा में ही है।

दो भागों में बंटा है मंदिर।

देव मंदिर दो भागों गर्भ गृह और मुख मंडप में बंटा है। करीब 100 फुट उंचे इस मंदिर का निर्माण बिना सीमेंट अथवा चूने-गारे का प्रयोग किए आयताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार वगरेकार आदि कई रूपों में पत्थरों को काटकर बनाया गया है। इस मंदिर पर सोने का एक कलश है। किवदंतियों के अनुसार यह सोने का कलश यदि कोई चुराने की कोशिश करता है तो वह उससे चिपक कर रह जाता है। हर साल चैत्र मास व कार्तिक मास में होने वाले छठ पर्व पर यहां लाखों श्रद्धालु छठ व्रत करने के लिए जुटते हैं।

देव मंदिर का छठ पूजा से संबंध।

देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी. तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था. इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूप आदित्य भगवान हुए, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी. कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया.

देव मंदिर में छठ करने से मिलती है सूर्य भगवान की आशीष।

मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में विराजमान हैं. गर्भगृह के मुख्य द्वार पर बाईं ओर भगवान सूर्य की प्रतिमा है और दायीं ओर भगवान शंकर के गोद में बैठी प्रतिमा है.

ऐसी प्रतिमा सूर्य के अन्य मंदिरों में देखने को नहीं मिलती है. छठ पर्व के दौरान यहां भव्य मेला लगता है. हर साल पूरे देश से लाखों श्रद्धालु यहां छठ करने आते हैं. मान्यता है कि जो भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं उनकी हर मनोकामना पूरी होती है. छठ के दौरान इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था और बढ़ जाती है.

वास्तुकला का स्पष्ट उदाहरण।

करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण डेढ़ लाख वर्ष पूर्व किया गया था। बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक व विस्मयकारी है।

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