जोगिरा, सारा रा रा.....से डीजे वाले बाबू तक का सफर

जोगिरा, सारा रा रा…..से डीजे वाले बाबू तक का सफर

उत्तर भारत के कई राज्यों में वसंत पंचमी के बाद से ही होली के गीत गाए जाने लगते हैं और यह सिलसिला होली तक जारी रहता है. इन गीतों को कई लोग फाग भी कहते हैं और कई लोग फगुआ.

होली को रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है। यह भारत में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है । हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा हर साल मार्च के महीने में जोश और उत्साह के साथ होली मनाई जाती है। जो लोग इस त्योहार को मनाते हैं, वे हर साल रंगों से खेलने और स्वादिष्ट व्यंजन खाने के लिए इसका बेसब्री से इंतजार करते हैं।

शहरों मे भले ही गाने-बजाने का माहौल डीजे की मस्ती के साथ जुड़ गया है, लेकिन गांवो मे तो अभी भी ढोल-मजीरे की थाप के साथ गीत गाए जाते हैं, लेकिन गांवो में तो कुछ दिन पहले से ही गीत-संगीत का दौर चालू हो चुका है।

यादों के रंग हज़ार

रघुबर से खेलब हम होली सजनी…रघुबर से…. और होरी खेले रघुबीरा….. जैसे गीतों का दौर जारी है. शाम ढलते ही एक टोली निकलती है. किसी के पास ढोल तो किसी के पास मजीरा. कहीं किसी चौपाल पर जुटे और माहौल शुरू.

यही तो फगुआ है. जी हां! फगुआ. फागुन के महीने वाला फगुआ ।

रंग और गुलाल की फगुआ।

फगुआ का मतलब फागुन से है. अंग्रेजी कैलेंडर में यह मार्च का महीना है, लेकिन भारतीय हिंदी कैलेंडर में यह फाल्गुन का महीना है. इसे ही फागुन कहा जाता है. फागुन में ही होली का त्यौहार आता है और इस दिन रंग खेलने की परंपरा है. बिहार और यूपी में सुबह में रंग खेलते हैं और शाम को अबीर गुलाल. इसी समय दरवाजे पर घूमके फगुआ गाने की परंपरा भी है. गांवों में फगुआ लोकगीत गाए जाते हैं, जिसे फाग भी कहा जाता है.

लोक गीतों का सफर।

भाषा के विकास के साथ लोक गीतों एवं नृत्यों के निर्माण का कार्य भी शुरू हुआ। माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में संगीत का उत्कृष्ट स्थान था। खनन कार्य से प्राप्त नृत्य शील नारी की कांस्य प्रतिमा तथा नृत्य, नाट्य और संगीत के देवता के रूप में शिव की पूजा का प्रचलन इस तथ्य को प्रमाणित करता है। वैदिक काल में संगीत को धार्मिक कार्यों के साथ जोड़ दिया गया था। सामवेद संगीत को समर्पित वेद है। यजुर्वेद में संगीत को अनेक लोगों की आजीविका का साधन बताया गया है। वैदिक काल में संगीत के सात स्वरों का आविष्कार हो चुका था। भारतीय महाकाव्य रामायण तथा महाभारत की रचना में भी संगीत का मुख्य प्रभाव रहा। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली एवं प्रकृति में अत्यधिक परिवर्तन हुआ।

चलते चलते कहां आ गए हम?

दौर था जब बसंत पंचमी के दिन होलिका स्थापित होने के साथ ही लोगों पर फागुन की मस्ती छा जाती थी। एक महीने तक गांवों में घर घर चौपाल लगती थी और फगुआ होता था। वहीं होली के दिन लोग फगुआ और जोगीरा के बीच पुराने गिले शिकवे भूल लोगों से गले मिलते थे लेकिन समय के साथ यह परम्परा मिटती दिख रही है। फगुआ की जगह फूहड़ता ने ले ली है तो और गांव से चौपाल भी गायब है।

अश्लील भोजपुरी गानों के बोझ तले दबती जा रही हमारी परंपरा।

बदलते दौर के साथ आज होली का मतलब हुडदंग हो गया है। गांवों में अब न तो चौपाल बैठती है और न ही होली धुरेड़ी के दिन घर-घर धूमकर फगुआ होता है। अब डीजे और कपड़ा फाड़ होली जिसे सही मायने में उपद्रव कहा जा सकता है। अश्लीलता के कारण तो अब होली का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। खासतौर पर फिल्मी अश्लीलता ने होली का मतलब ही बदल दिया है। ‘भतिजवा क माई जिंदाबाद‘, रंगवा गइल पेटीकोट में जैसे गीत इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। आज के समय में युवा वर्ग अपने परंपरा को भूल अंधाधुंध इनके पीछे भाग रहा है।

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