जातिगत भेदभाव को अपनी कला से मात देती है कि युवा कलाकार- मालविका राज

आमतौर पर लोगों का मानना है कि बिहार की नस-नस में जातिगत भेदभाव है। कई परिदृश्यों में शायद यह विचार सही भी है। यहां के चुनावी प्रचार और चुनावी मतदान में यह भेदभाव साफ- तौर पर देखने को मिलता है। लेकिन इस जातिगत भेदभाव को खत्म करने के प्रयास करने वालों की भी बिहार में कमी नहीं है। बिहार में ऐसे कई लोग हैं जो कभी आंदोलन तो कभी अपने कला के माध्यम से इस भेदभाव की जड़ को काटकर फेंकने का हर संभव प्रयास करते हैं। उन्हीं में से एक है- मालविका राज।

मालविका का जन्म 18 सितंबर 1990 को एक दलित परिवार में हुआ। वह पटना की एक भारतीय कलाकार और फैशन डिजाइनर हैं। उन्होंने निफ्ट मोहाली, पंजाब से स्नातक पास की है। वह मधुबनी शैली में पेंटिंग करतीं हैं। पहले मालविका राज दिल्ली में फैशन डिजाइनर के तौर पर काम करती थीं। लेकिन बाद में स्वास्थ्य कारणों की वजह से वह पटना आ गईं। यहीं उन्होंने कलाकार अशोक विश्वास के द्वारा मधुबनी कला में प्रशिक्षण लिया। कई प्रमुख प्रदर्शनियों में भी उनकी कला का प्रदर्शन हो चूका है। उनकी एक पेंटिंग बाबासाहेब अंबेडकर की मधुबनी प्रस्तुति एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में प्रदर्शित हो चुकी है। वह कला के द्वारा अपनी जातिगत अनुभवों को लोगों से साझा करतीं हैं। दलित पहचान और बौद्ध धर्म से संबंधित विषयों को व्यक्त करने के लिए पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करतीं हैं।

मधुबनी कला को अनिवार्य रूप से हिंदू पौराणिक कथाओं की कहानियों को बताने का एक तरीका माना जाता है। मधुबनी पेंटिंग के माध्यम से रामायण, महाभारत, कृष्णलीला आदि की कहानियों के दृश्यों को दर्शाया जाता है। मधुबनी शैली का एक उपसमुच्चय, जिससे मालविका ने सबसे अधिक प्रेरणा ली है, वह कोहबर है। यह शैली प्रकृति के चित्रण पर केंद्रित है और मुख्य रूप से उन दीवारों को चित्रित करने के लिए उपयोग की जाती है जहां दूल्हा और दुल्हन एक शादी समारोह के दौरान बैठे होते हैं। मालविका के पेंटिंग पर प्राकृतिक का गहरा प्रभाव दिखता है। उन्होंने अपनी कला से भगवान बुद्ध, बाबासाहेब अंबेडकर और उनके दिल के करीब अन्य क्रांतिकारियों के जीवन और कहानियों को चित्रित करके इस पद्धति में बदलाव लाने की कोशिश की है।

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि जब वह मधुबनी पेंटिंग सीख रही थीं तब सबसे पहले उन्होंने ” श्री कृष्ण” की पेंटिंग बनाई थी। लेकिन उन्हें उस पेंटिंग से कुछ जुड़ाव महसूस नहीं हुआ। तब उन्होंने खुद से पूछना शुरू किया कि आखिर उनकी कहानी क्या होगी? वो कौन- सा चीज होगा जो उन्हें उनके कला से जोड़ेगा? उनका परिवार हमेशा से राजनीतिक था। यहां तक कि जब वह बच्ची थी तब भी उनके पिता उन्हें हमेशा और अंबेडकर के विचारों के बारे में बताते थे। निम्न समुदाय के लिए उनके योगदान के बारे में बताते थे। उनकी कहानियों से मालविका हमेशा प्रेरित होती थीं। जब उन्होंने बुद्धा के जीवन से एक दृश्य चित्रित किया तब उन्हें अपनी कला से असली जुड़ाव महसूस हुआ। अपनी कला का इस्तेमाल कर वो अंबेडकर की कहानियों को लोगों के बीच प्रस्तुत करना शुरू की।

एक बार इस कला को और गहराई से सीखने के लिए वह मधुबनी गांव घूम रही थी। इस भ्रमण के दौरान उन्होंने जाना कि कला जगत में भी जातिगत मतभेद कितना गहराई से समाया हुआ है। ऐतिहासिक रूप से मधुबनी कला का तांत्रिक उपसमुच्चय केवल ब्राह्मणों द्वारा हि बनाया जाता है। भ्रमण के दौरान वो एक ब्राम्हण तांत्रिक कलाकार से मिली। जब उन्होंने उनसे यह कला सिखाने का अनुरोध किया तो ब्राह्मण ने उन्हें निचली जाति का बता कर मना कर दिया। माना जाता है कि पेंटिंग में डबल लाइन तकनीक केवल ब्राह्मणों द्वारा और सिंगल लाइन तकनीक का उपयोग केवल दलितों द्वारा किया जाना चाहिए। मधुबनी पेंटिंग का गोदना स्वरूप सिर्फ दलितों द्वारा बनाया जाता है। इन्हीं भेदभाव की वजह से उन्होंने हिंदू संरचना से संबंधित कोई भी पेंटिंग नहीं बनाने का निश्चय किया। उन्होंने उन्हीं कहानियों को चित्रित करने का सोचा जो उन्हें प्रेरणा देती है। इसलिए उन्होंने पहली श्रृंखला चित्रित की, जिसे यात्रा कहा जाता है जो भगवान बुद्ध के जीवन की कहानी बताती है।

मालविका मधुबनी आर्टिस्ट के साथ-साथ एक सफल फैशन डिजाइनर भी हैं। वो वर्तमान में एक परियोजना पर काम कर रहीं हैं जो उनके इन दो कौशल को जोड़ती है। फिलहाल वो एक मधुबनी स्टाइल कपड़ों की लाइन पर कार्य कर रहीं हैं। उनके फैशन ब्रांड का नाम “मस्क मिगी” है। इस प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने लगभग 30 महिलाओं को ट्रेन किया है जो काफी आकर्षक साड़ी, बैग, चूड़ी, इत्यादि बनाती है। राज के काम को भारत में जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और दिल्ली में ललित कला अकादमी में प्रदर्शित किया गया है। उनके काम को समकालीन दलित राजनीति और दृष्टिकोण में पहचान और लाइव मिंट पर लेखों में चित्रण के रूप में इस्तेमाल किया गया है। राज ने हाल ही में सावित्रीबाई फुले पर आधारित एक किताब “सावित्रीबाई और मैं”, संगीता मुले द्वारा लिखित एक पुस्तक का चित्रण किया है। उनका सपना है कि वह बच्चों के लिए एक ऐसा बुक बनाएं जिसके हर पेज पर बाबा साहब के जीवन का दृश्य चित्रित हो। वो दृश्य एक कहानी बयां करे।

Malda Aam

Don’t Want to miss anything from us

Get Weekly updates on the latest Beats from
Bihar right in your mail.