ये छठ जरूरी है | एक कविता बिहार से

कुमार रजत दैनिक जागरण पटना में डिप्टी चीफ सब एडिटर हैं। पत्रकार होने के साथ खूब कविताएं भी लिखते हैं। अपनी पत्रकारिता में ये पटना शहर के जड़ को ढूंढते रहते हैं। मसलन “हर घर कुछ कहता है” और इसी तरह कई रचनात्मक कार्य पत्रकारिता में कर रहे हैं। मूल रूप से डुमरांव के हैं, मगर जन्म और पढ़ाई लिखाई पटना में ही हुई। 10 साल से पत्रकारिता में हैं।
कविताओं में ये सीधे सीधे अपनी भावनाओं को आसान शब्दों में व्यक्त करते हैं। इनका मानना है कि कविता ऐसी हो जो समाज के आखिरी मनुष्य तक को समझ में आये। यही बात इन्हें दूसरों से अलग करती है। भावनाओं का परिचय देते हुए अपनी कविता में एक जगह कहते हैं ” मोहब्बत में हज़ारों गम हैं, हज़ारों खुशियां हैं, वो रोये तो मुहर्रम है, वो हंस दे तो दीवाली है।”
फ़िलवक्त आज इनकी एक कविता छठ पर।
“ये छठ जरूरी है” कविता 2014 में लिखी थी जो पिछले 2 साल से वायरल है।
प्रस्तुत है पटनबीट्स की तरफ से “एक कविता बिहार से” में कुमार रजत की एक कविता जिसका शीर्षक है, ये छठ जरूरी है।

 

 

ये छठ जरूरी है
धर्म के लिए नहीं। समाज के लिए। हम आप के लिए जो अपनी जड़ों से कट रहे हैं।

ये छठ जरूरी है
उन बेटों के लिए जिनके घर आने का ये बहाना है। उस माँ के लिए जिन्हें अपनी संतान को देखे महीनों हो जाते हैं। उस परिवार के लिए जो टुकड़ों में बंट गया है।

ये छठ जरूरी है
उस नई पौध के लिए जिन्हें नहीं पता कि दो कमरों से बड़ा भी घर होता है। उनके लिए जिन्होंने नदियों को सिर्फ किताबों में ही देखा है।

ये छठ जरूरी है
उस परम्परा को जिन्दा रखने के लिए जो समानता की वकालत करता है। जो बताता है कि बिना पुरोहित भी पूजा हो सकती है। जो सिर्फ उगते सूरज को नहीं डूबते सूरज को भी सलाम करता है।

ये छठ जरूरी है
गागर निम्बू और सुथनी जैसे फलों को जिन्दा रखने के लिए। सूप और दौउरा को बनाने वालो के लिए। ये बताने के लिए कि इस समाज में उनका भी महत्त्व है।

ये छठ जरूरी है
उन दंभी पुरुषों के लिए जो नारी को कमजोर समझते हैं।
ये छठ जरूरी है। बेहद जरूरी।

 

 

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Quote of the day:“The more I live, the more I learn. The more I learn, the more I realize, the less I know.” 
― Michel Legrand

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