क्या आपके शहर का मिजाज़ भी इस शहर जैसा ही है?

अलग मिजाज़ है इस शहर का। ठण्ड कड़ाके की पड़ती है, लेकिन लोगों के अपनेपन की गर्माहट हमें ज़िंदा रखती है। सुबह उठते ही फ़र्श पर पैर रखने से पहले, खिड़की से झाँक कर मौसम का हाल चाल ले लेते हैं। ठण्ड कितनी भी हो, गर्माहट वो नुक्कड़ वाले चाचा की चाय ही दिलाती है। बिना चीनी वाली चाय से लेकर दूध से लबालब गाढ़ी चाय, चाचा को सबकी पसंद का पता है। ये जो चच्चा है ,चाय भी दुकान पर हो रही बहस के मिज़ाज़ के हिसाब से चाय बनाते है। यहाँ चाय रिश्ते जोड़ती है। वैसे ये जो चाय है माँ और मोहल्ले की बाकी आंटियों के लिए पड़ोस वाले घर की औक़ात पता करने का भी काम करती है। माँ को कई बार मुँह बिचकाते हुए कहते सुना है – “तिवारी जी के यहाँ चाय में दूध कम था, कमाई कम हुई होगी इस महीने।”

अलार्म बजने से पहले माँ की नींद खुल जाती है। कभी कभी ऐसा लगता है माँ अलार्म बाकियों को उठाने के लिए लगाती है। नाश्ते के साथ टिफ़िन देने के बाद माँ पूरी ताक़त से जब घर के लड़कों के बाल चपटा करती है तो उसमें उसकी ममता कम और मोहल्ले वालों के तानों का डर ज्यादा होता है।  “आपका बेटा तो हीरो है, बाल का स्टाइल देखिये,” – ऐसे ही कई तानों ने कई लड़को को स्कूल ‘शक्तिमान’ वाले गंगाधर की तरह जाने पर मजबूर किया है। वो तो इन लड़को की कला है जो इतनी अड़चनो के बाद भी इनकी छोटी सी प्रेम कहानी शुरू हुई। घर से निकलते ही शर्ट की बाहें ऊपर और गले को घुटन से छुट्टी देने के लिए ऊपर वाली बटन खुल जाती है। घर से बस स्टॉप तक जाते जाते ना जाने कितनी बार सड़क के किनारे पार्क किये हुए कारों के शीशे में शकल देखते हैं। बस पर चढ़ते ही नज़र अपने जिगरी ढूंढती है और उसके बाद किसी ख़ास को। बस की यात्रा ही पूरे दिन की भाविष्यवाणी करती है।

उधर घर पर नाश्ता कर के सब अपने अपने दफ़्तर सरकने की तैयारी में लग जाते हैं। घर से भले ही कड़क सी चाय पी कर दफ़्तर को निकले हो, नुक्कड़ वाली चच्चा की चाय अनिवार्य है। अच्छे-अच्छे हैंगओवर दूर कर देती है चच्चा की चाय। चाचा को जाते जाते 100 का नोट देना और बोलना – ” पिछला सब देख लेना”, हर हफ्ते की कहानी है। हमारे शहर में लोग भरोसा करते हैं, चाय वाले पर कि वो ईमानदारी से आपके पुराने हिसाब ही कटेगा, आपको उल्लू नहीं बनाएगा। घर से दफ़्तर तक का रास्ता थोड़ा मुश्किलों से भरा होता है। ट्रैफ़िक, ऑटो में छोटी सी जगह में आधा लटक कर बैठना, किसी बुजुर्ग़ या महिला के आने पर पिछली सीट छोड़ आगे ड्राइवर के साथ बैठना, ऑटो वाले का लहरिया मारना और इतना सब कुछ झेलने के बाद खुल्ले पैसे की झिक-झिक से माथा गरम होना – दिन की शुरुआत अमूमन ऐसी ही होती है।

ऑफिस तो कट ही जाता है- जैसे तैसे। कुछ चमचों को झेलना, कुछ जो सिर्फ आपका डब्बा खाने आते हैं, कुछ जो सिर्फ सिगरेट पीने, कुछ लोग जिन्हे नौकरी प्यारी होती है और कुछ लोग जिन्हे काम। वैसे काम से प्यार करने वाले लोग थोड़े कम है लेकिन ये आपको अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर घड़ी में बजते हैं पांच। अब ये जो सफ़र है दफ़्तर से घर का – अद्भुत है। वीकेंड्स की प्लानिंग इसी वक़्त होती है। पान और गोलगप्पे खाते खाते सब घर पहुंचते हैं। चाय और बिस्कुट से स्वागत होता है। सुबह जो दफ़्तर जाते वक़्त सामान की लिस्ट मिली थी वो आप हर दिन भूलते हैं और ‘अच्छा कल’ कह कर टाल देते हैं।

ये लिस्ट बड़ी हो कर वीकेंड में शॉपिंग का बहाना बनती है। सब्ज़ी खरीदने जाओ तो सब्ज़ी का भाव चिल्लाते सब्ज़ीवाले, कुछ सब्ज़ियों को चाव से खाती गाय, उन गायों को भगाते छोटे लड़के, बड़ी सिंघ वाली गाय से डरकर पत्नी अपने पति की कलाई ज़ोर से पकड़ती हुई और यहाँ वहां पान खा कर थूकते चाचा – पूरा माहौल सेट होता है। थोड़ा प्यार, थोड़ा गुस्सा ; कभी ठंडा कभी गरम; थोड़ा जवान, थोड़ा बूढ़ा- इस शहर का मिजाज़ ऐसा ही है।

मेरे हिसाब से हर शहर ऐसा ही है- चाय वाले चाचा, चुगली करती आंटी, ताने कसती दादी , ईमानदार लोग, बिना अलार्म वाली माँ, हीरो लड़का, हिरोइन लड़की, पान थूकते चाचा, थोड़े आलसी पापा और एक छोटा कोना। शायद बहुत सारे लोग ताल्लुक़ रखते हो मेरे शहर की परिभाषा से। मेरा शहर ऐसा ही है। मैं जिस शहर की बात कर रही हूँ वो पटना है – बिहार। जब लगभग सारे शहर ऐसे ही हैं, तो फिर किसी एक राज्य या शहर को स्टीरियोटाइप  क्यों करते हैं हम ?

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Arthur Rubinstein


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