जाने बिहार के स्वतंत्रता सेनानी डॉ राजेंद्र प्रसाद कैसे बने देश के पहले राष्ट्रपति

उन्होंने देश की सेवा केवल राष्ट्रपति बनकर नहीं की बल्कि उस से बहुत पहले से वो देश की आजादी के संघर्ष का सक्रिय हिस्सा थे।

“जो बात सिद्धांत में गलत है वह व्यवहार में भी उचित नहीं है” -डॉ राजेंद्र प्रसाद

3 दिसम्बर 1884 को जीरादेइ, बिहार में महादेव सहाय और कमलेश्वरी देवी के घर डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था। उस समय देश में ब्रिटिश राज था। उनके पिता चाहते थे की वो हिंदी, पारसी और अंकगणित सीखे जिसके लिए राजेन्द्र प्रसाद एक मौलवी से शिक्षा लेते थे। जून 1896 में 12 वर्ष की आयु में राजवंशी देवी से उनका विवाह संपन्न हुआ और उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने मृत्युंजय रखा था।

हमेशा कुछ सीखने की ललक उन्हें कलकत्ता यूनिवर्सिटी ले गयी जहाँ प्रवेश परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया और उन्हें तीस रूपये प्रतिमाह की छात्रवृति भी मिली। उनकी काबिलियत से वहां के प्रोफेसर काफी प्रभावित थे। एक परीक्षा में एक प्रोफेसर ने उनकी परीक्षा पत्र में लिखा “Examinee is better than the examiner”।

अपने कालेज जीवन में वो हमेशा समाजिक कार्यों में काफी सक्रिय थे और द डावन सोसाइटी के क्रियात्मक सदस्य भी थे। 1906 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर बिहारी छात्र सम्मेलन की स्थापना की जिसने बाद में देश को आजादी की लड़ाई के कई कर्णधार जैसे अनुग्रह नारायण सिंह और कृष्णा सिंह दिए। उन्हें सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी में भी स्थान देने की पेशकश हुई थी जिसे उन्हें पारिवारिक कारणों से ठुकराना पड़ा।

इसी साल वो पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस के संपर्क में आये थे, वो इस पार्टी के प्रेसिडेंट तीन बार बने, पहले 1934 में फिर क्रमशः 1939 और 1947 में।

1906 में वो पार्टी की वार्षिक मीटिंग में शामिल हुए और 1911 में औपचारिक तरीके से पार्टी में शामिल हो गये। अर्थशास्त्र की पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए बतौर अंग्रेजी के प्रोफेसर काम किया। उसके बाद रिपन कालेज (जिसे अब सुन्दरनाथ लॉ कॉलेज के नाम से जाना जाता है) से लॉ की पढाई की और साथ साथ वो कलकत्ता सिटी कालेज में अर्थशास्त्र भी पढ़ते रहे।

आखिरकार वो गोल्ड मेडल के साथ ग्रेजुएट हुए और 1937 में पीएचडी करके वो डॉ राजेन्द्र प्रसाद कहलाये। 1915 से 1920 तक वो बिहार और ओडिशा में लॉ की प्रैक्टिस कर रहे थे और साथ ही साथ पटना यूनिवर्सिटी में सीनेट और सिंडिकेट में भी नियुक्त थे। 1916 में महात्मा गाँधी से मिलने के बाद उनका जीवन बदल गया।

गाँधीजी के सिद्धांतो से, और 1920 के असहयोग आन्दोलन में जिस निष्ठां और आस्था से वो उन सिद्धांतो का पालन कर रहे थे, से प्रभावित होकर राजेन्द्र प्रसाद अपनी वकील की नौकरी छोड़ कर स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े।

15, जनवरी 1934 को बिहार में आये भूकम्प के समय राजेन्द्र प्रसाद सत्याग्रह में शामिल होने के लिए जेल में थे। भूकंप के दो दिन बाद जेल से छुटते ही वो भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए बिहार सेंट्रल रिलीफ कमिटी बनाने में जुट गये थे। एक साल बाद जब क्वेटा में भूकंप आया तब भी उन्होंने सिंध और पंजाब में राहत कार्य किया।

उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नही देखा। वे उस समूह का हिस्सा थे जिसने बिहार विद्यापीठ की स्थापना की थी। बिहार विद्यापीठ सीधे तौर पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को नकार रहा था क्यूंकि महात्मा गाँधी का आग्रह था की अंग्रेजी शिक्षा का बहिष्कार किया जाए। राजेंद्र प्रसाद क्रन्तिकारी अख़बारों मसलन सर्चलाईट और देश के लिए आलेख भी लिखने लगे थे और उनके लये धन भी इकठा करने लगे थे। उन्होंने कई जगहों पर जाकर भीड़ इकठ्ठा कर के लोगों को स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

सिर्फ क्रन्तिकारी नहीं बल्कि मानवता से जुड़े मुद्दे भी उनके दिल के करीब थे।

उनका खुला विद्रोह अंग्रेजों से छुपा नहीं था। 8 अगस्त 1942 को सरकार ने भारत छोडो प्रस्ताव के पास होने पर देश के कई नेताओं की गिरफ्तारी हुई। कहा जाता है की अपनी तकलीफों से ज्यादा उन्हें अपने परिवार की चिंता रहती थी। उसमे से एक राजेंद्र प्रसाद भी थे जिन्होंने पटना के बांकीपुर जेल में तीन साल की सजा काटी। छूटने के बाद वे नेहरु जी की अंतरिम कैबिनेट में शामिल हो गए जहाँ उन्हें खाद्य एवं कृषि मंत्रालय सौंपा गया था। 1946 में उन्हें संविधान सभा का प्रेसिडेंट चुना गया था।

26 जनवरी 1950 जब देश का संविधान लागू हुआ तब डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति कार्यालय को बतौर देश के पहले राष्ट्रपति संभाला। हालाँकि नेहरु समर्थकों ने इसका विरोध भी किया पर हर चुनाव में राजेंद्र प्रसाद भारी बहुमत से विजयी हुए। नेहरु जी के साथ उनके मतभेद बने रहे खासकर के हिन्दू कोड बिल के समय जब राजेंद्र प्रसाद का मानना था की यह बिल देश की संस्कृति और धरोहरों की रक्षा करेगा।

डॉ राजेंद्र प्रसाद एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने 12 साल ऑफिस में बिताये। जब उन्होंने त्यागपत्र दिया तब रामलीला मैदान में उन्हें विदा करने के लिए लोगो की भीड़ उमड़ आई थी।

उनका राष्ट्रपति काल उनके सिद्धांतों से परिभाषित था। वो अपने 10,000 रूपये के वेतन का सिर्फ आधा हिस्सा लेते थे और अपने कार्यकाल के अंत में केवल 2500 रूपये ही लेते थे। वो अपने सरे काम खुद ही करते थे और अपने पास सिर्फ एक व्यक्तिगत कर्मचारी रखा था। उन्हें तोहफों से नफरत थी और बस लोगों की दुआएं लेना पसंद करते थे। वो सही मायनों में लोगों के राष्ट्रपति थे और उनके समर्थक उनकी सादगी और विनम्रता के कायल थे। देश के लिए की हुई उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 1962 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

1962 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया जिसने उन्हें तोड़ दिया था,उन्होंने अपने आखिरी दिन पटना के सदाकत आश्रम में बिताये थे। 28 फरवरी 1963 को उनका स्वर्गवास हो गया। हम भारतीय डॉ राजेंद्र प्रसाद को देश के राष्ट्रपति के रूप में जानते हैं पर राष्ट्रपति कार्यालय सँभालने से पहले उनके संघर्ष और आज़ाद भारत के सपने की यात्रा भी अविस्मरनीय है।

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Quote of the day: “He who has a why to live for can bear almost any how.” 
― Friedrich Nietzsche

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