पटना का प्रेस जिसके पास था भारतेंदु हरिश्चंद्र की सम्पूर्ण रचनाओं का कॉपीराइट

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहे जाते हैं. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने अलग-अलग विधाओं में लेखन किया.

महज पैंतीस साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई लेकिन उनके समय को हिंदी का भारतेंदु युग कहा जाता है. भारतेंदु और पटना का खास जुड़ाव रहा है.

जीवन काल में ही उन्होंने अपनी सारी रचनाओं का कॉपीराइट पटना की खड्गविलास प्रेस को दे दिया था.

रामदीन सिंह ने पटना में 1880 में खड्गविलास प्रेस की स्थापना की थी. प्रेस शुरू करने से पहले वे बिहार में हिंदी के लिए आंदोलन चला रहे थे.

साल 2000 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की किताब “आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका” प्रकाशित हुई थी. इसके लेखक डॉक्टर धीरेन्द्रनाथ सिंह हैं. इस किताब के मुताबिक यह आधुनिक हिंदी की पहली प्रेस थी.


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इस किताब में धीरेन्द्रनाथ सिंह बताते हैं, “रामदीन सिंह के मित्र एवं कवि और नाटककार मझौली नरेश लाल खड्गबहादुर मल्ल भारतेन्दु के भी करीबी थे. उन्होंने ही रामदीन सिंह का परिचय भारतेन्दु से कराया था.

कर्ज़ से मुक्त कराने पर मिला कॉपीराइट

प्रो. राम निरंजन परिमलेंदु बिहार सरकार के सर्वोच्च साहित्य सम्मान ‘राजेंद्र शिखर सम्मान’ से सम्मानित हिंदी साहित्य के इतिहासकार हैं.

वे खड्गविलास प्रेस को भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाओं का कॉपीराइट मिलने के बारे में बताते हैं, “भारतेंदु हरिश्चंद्र उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिंदी के सर्व्यमान्य नेता थे.

तब साहित्य के एक बड़े केंद्र बनारस के वो सबसे बड़े आकर्षण थे. भारतेंदु को आश्चर्यजनक ढंग से प्रसिद्धि मिल गई थी. लेकिन तब तक भारतेंदु शाहखर्च (बहुत अधिक ख़र्च करने वाला) होने और दूसरी वजहों से कर्ज में डूब गए थे.

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ऐसे में उस जमाने में रामदीन सिंह ने भारतेंदु को एक मुश्त चार हज़ार रूपये देकर उन्हें कर्ज से मुक्त किया. इतना ही नहीं इसके बाद भी रामदीन सिंह ने कई बार भारतेंदु की आर्थिक मदद की.”

इस सम्बन्ध में धीरेन्द्रनाथ सिंह की किताब में भारतेंदु द्वारा तब के कलकत्ता के एक मित्र को पत्र लिखने का जिक्र है.

जिसमें वे लिखते हैं, “सम्प्रति रामदीन सिंह ने एक साथ चार हजार रुपये देकर मुझे उऋण किया है. वे ‘क्षत्रिय पत्रिका’ के संपादक हैं. अब मैं किसी को पुस्तकें छापने न दूंगा, प्रकाशित-अप्रकाशित समस्त पुस्तकों का स्वत्व भी इन्हीं को दिये देता हूं.”

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प्रेस का स्वर्ण काल

प्रोफ़ेसर राम निरंजन परिमलेंदु बताते हैं, “1882 में मिले इस अधिकार-पत्र को उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में जमकर छापा. इस करार के बाद भारतेंदु जब भी पटना आते थे तो खड्ग विलास प्रेस में ही रुकते थे.”

“अखिल भारतीय स्तर पर उस जमाने का शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार रहा होगा जिसके रिश्ते इस प्रेस न रहे हों. यह प्रेस तब साहित्कारों का तीर्थ बन गई थी. 1935 तक इस प्रेस का स्वर्ण काल रहा.”

भारतेंदु के निधन के बाद 1888 के करीब उनकी छह खण्डों वाली ग्रंथावली का प्रकाशन भी खड्गविलास प्रेस ने ही किया.

इसके नाटक, गद्य, काव्य खंड अलग-अलग थे. यह तब हिंदी में संभवतः किसी भी लेखक की प्रकाशित पहली ग्रंथावली थी.

इतना ही नहीं रामदीन सिंह की कोशिशों से भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रमाणिक और विस्तृत जीवनी का प्रकाशन भी हुआ. साल 1905 में शिवनंदन सहाय द्वारा सम्पादित ‘सचित्र हरिश्चंद्र’ का प्रकाशन खड्गविलास प्रेस ने किया था.

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कॉपीराइट का पहला मुक़दमा करने वाली प्रेस

प्रोफेसर राम निरंजन परिमलेंदु के मुताबिक सम्पूर्ण भारतीय भाषाओँ के इतिहास में कॉपीराइट का पहला मुकदमा भी इसी प्रेस की ओर से पटना में किया गया था.

बनारस की भारत जीवन प्रेस ने भारतेंदु की ‘अंधेर नगरी’ नाटक की किताब बिना खड्गविलास प्रेस के अनुमति के छाप दी थी. ऐसे में खड्गविलास प्रेस ने भारत जीवन प्रेस पर कॉपीराइट का मुकदमा कर दिया.


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मुकदमा पटना की अदालत में चला जिसमें खड्गविलास प्रेस की जीत हुई. पटना के जिला जज ने 17 दिसम्बर, 1886 को रामदीन सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया.

परिमलेंदु बताते हैं, “इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुनवाई के दौरान पटना आने पर भारत जीवन प्रेस के प्रोपराइटर रामकृष्ण वर्मा खड्गविलास प्रेस में आकर ही ठहरते थे.”

“दोनों एक साथ कोर्ट जाते और वहां से अपने-अपने वकीलों के पास चले जाते. उस दौर का सामाजिक सौहार्द कुछ ऐसा था.”

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खड्गविलास प्रेस तब के भारत के गिने-चुने बड़े छापाखानों में से एक था. रामदीन सिंह का जन्म 1856 और उनकी मृत्यु 1903 में हुई. वे खुद भी एक लेखक थे.

परिमलेंदु का कहना है कि उन्होंने 1882 में बिहार दर्पण नाम से एक किताब लिखी थी जो हिंदी की पहली जीवनी पुस्तक है. इसमें गुरु गोविंद सिंह सहित कई हस्तियों और समाज सुधारकों की जीवनी छपी थी.

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ लिखित खड़ी बोली हिंदी के पहले महाकाव्य प्रिय-प्रवास का प्रकाशन भी 1915 में इसी प्रेस ने किया था.

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मिट गई राष्ट्रीय धरोहर

आज पटना के अशोक राजपथ पर जहाँ बीएन कॉलेज है उसके सामने वाली गली में थोड़ा अन्दर जाने पर यह प्रेस था. आजादी के बाद साठ के दशक तक यह प्रेस वजूद में रहा लेकिन तब तक यहाँ साहित्य का प्रकशन बंद हो गया था, केवल छपाई के काम होते थे.

जिस मकान में यह प्रेस था वह अब बिक चुका है. डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी ने यह मकान ख़रीदा और कुछ दिनों बाद उसी ज़मीन पर नर्सिंग होम की नई इमारत खड़ी की.

डॉक्टर सिद्दीकी ने बताया, “1988 में मैंने जब यह दोमंजिला बिल्डिंग खरीदी तब यह बहुत बुरी हालत में थी. लोग इस मकान को भुतहा बताते थे और कोई इसे लेने को तैयार नहीं था.”

डॉ उमेश कुमार पांडे

डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी खड्गविलास की ऐतिहासिक अहमियत से अनजान हैं. इस प्रेस के बारे में उन्हें बस इतना ही पता है कि यहाँ कभी अंग्रेजों के सरकारी कागजात छपते थे.

वहीं जहाँ कभी यह मशहूर प्रेस हुआ करती थी उसी के पास की नवरंग गली में दिवंगत नन्द किशोर पांडेय का मकान है.

खड्गविलास प्रेस के पुराने कर्मचारियों में एक नन्द किशोर पांडेय भी थे. वे इस प्रेस में प्रूफ रीडर थे. इनके बेटे और संगीत शिक्षक उमेश कुमार पांडेय के पास उस ज़माने की धूमिल यादें ही बची हैं.

वे बताते हैं, “उस ज़माने में साहित्य और पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए यह प्रेस मशहूर थी. मैं भी कुछेक बार पिता जी के साथ प्रेस पर गया था. साधारण मगर प्रेस की बड़ी सी बिल्डिंग थी. नीचे छपाई का काम होता था और ऊपर लोग रहते थे.”

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खड़ी बोली आंदोलन

हिंदी भाषा और इसके साहित्य के प्रचार-प्रसार में खड्गविलास प्रेस की भूमिका को संजोकर, सहेज कर नहीं रखा जा सका.

आज इस प्रेस की पुस्तकें दुर्लभ हो गई हैं. यह राष्ट्रीय धरोहर लगभग नष्ट हो गई.

हिंदी साहित्य के युवा शोधकर्ता अरुण नारायण बताते हैं, “खड़ी बोली हिन्दी की संवृद्धि में खड्गविलास प्रेस की भूमिका कई कारणों से उल्लेखनीय रही है. एक तो इसने खड़ी बोली आंदोलन को गति दी जिसके फलस्वरूप कचहरियों और विद्यालयों में फारसी के बरक्स हिन्दी मान्य हुई.”

“दूसरी इसने एक भाषा के रूप में इसके प्रचलन के लिए पाठ्यक्रम बनाए, साहित्य की कई विधाओं और क्षेत्रों से लेखकों को खड़ा किया और इसे आम लोगों में लोकप्रिय बनाने के लिए सात पत्रिकाएं निकालीं.”

“आधे दशक तक हिन्दी के विकास के लिए जो काम इस संस्था ने किया उसकी नजीर अन्यत्र दुर्लभ है.”

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Source: पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए

 

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