मेरा—तेरा किसके हिस्से का कितना सावन ?

विमलेन्दु सिंह :

जब मंद शीतल पवन चलने लगे…आसमान में बादल घुमड़ने लगे…बादलों से बरसती बूंदें आपके तन—मन को भिगोने लगे… दादुर की किलोर…कोयल की कूक और पपीहे की पीहू—पीहू के साथ ही मोर पंख उठाकर नाच उठे, तो जनाब का अंदाजा ठीक है, सावन आ चुका है. जब धरती जेठ के ताप से तपकर सूख जाती है तो उसे राहत देने के लिए सावन आता है. सावन मस्ती के मद से भरा हुआ, गर्व से झूमता हुआ आता है. आया सावन झूम के।

गरजते-ठनकते और उमड़ते-घुमड़ते मेघ, कड़कड़ाती- चमकती बिजलियां और झमाझम बरसती सावन की बूंदें. उनकी टिप..टिप..टिपिर..टिपिर की रागिनी का संगीत किसे मंत्रमुग्ध नहीं कर देता है ! सावन का आना तो ऐसा ही लगता है मानो प्रकृति ने कजरी की मीठी मधुर तान छेड़ दी हो. कहते हैं सावन की रिमझिम फुहार का आनंद घर में प्रियतमा के संग पकौड़े और चाय का जायका लेते हुए आता है. लेकिन कामकाजी लोगों को ऐसे खुशगवार पल कम ही नसीब होते हैं.

वैसे बरसाती पानी में भीगने का भी अपना ही सुख है. यह वर्णनातीत सुख कुछ के लिए सुख होता है तो कुछ के लिए भारी दुखदायी. बच्चों के हिस्से का सावन जब बरसता है तो पानी में ‘छई—छपाछई छपाक-छई’ करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता. बड़ों के लिए भले ही वह सड़क की गंदगी से भरा हुआ और नाली से उफनकर आया हुआ पानी हो, लेकिन बचपन इन सारी बंदिशों से ऊपर होता है. मां के हाथों से कलाई छुड़ाकर छत पर भीगने और उसके बाद तौलिया से सिर पुंछवाते हुए डांट खाने का सुख और किसी भी उम्र में मयस्सर नहीं होता है. ऐसा ही नजारा इन दिनों आपको मिलर स्कूल के मैदान में देखने को खूब मिलता है. खुले मैदान में फुटबॉल खेलने वाले बच्चे इन दिनों जमकर वॉटर पोलो का आनंद ले रहे हैं.

घरेलू महिलाओं के लिए सावन आफत का दूसरा नाम है. अगर शादी नई है तो सावन के मायने दूसरे हैं अगर शादी के पांच या सात साल बीत चुके हैं तो फिर सावन क्यों आया है, पता ही नहीं चलता. नई शादी होती है तो पति अक्सर पत्नियों को लेकर लांग ड्राइव पर निकल जाया करते हैं. बरसात में भीगते हुए सड़क किनारे खोमचे से भुट्टा खरीदकर खाने का जो आनंद प्रेमी युगल और नवविवाहित जोड़ों को आता है, शादीशुदा जीवन के कुछ वर्ष बीतने के बाद अक्सर धूमिल हो जाता है. विवाहित महिलाएं परमात्मा से प्रार्थना करती हैं कि प्रभु आज पानी न गिरे तो गीले कपड़े सूख जाएं. स्कूल से बच्चे यूनीफॉर्म गीली और कीचड़ में लपेटकर लाते हैं. पतिदेव का भी लगभग यही हाल होता है. सूखे कपड़े तो सबको चाहिए, देना कैसे है, इसकी जिम्मेदारी सिर्फ गृहिणी पर ही होती है. नतीजतन पूरे घर के हर कमरे में रस्सियां बांधकर कपड़े लटकाए जाते हैं और पंखे चालू कर दिए जाते हैं. पतिदेव और बच्चे अगर छुट्टी के दिन घर पर हैं तो उस दिन भी बरसात में डिमांड गर्म पकौड़े और चाय की होती है. महिलाओं का सावन आमतौर पर ऐसा ही होता है.

कामकाजी इंसान का सावन बचपन जितना सुखदायी नहीं होता है. बारिश के पानी से भरे रास्ते और उस पर हिचकोले खाती बाइक की सवारी तन ही नहीं मन को भी भिगो देता है. सावनों की फुहारों में भीगने का नहीं बल्कि पर्स, मोबाइल और दस्तावेजों को पानी से बचाने का मन करता है. पुराने पड़ चुके स्कूटर और बाइक के पहिये सड़क के गड्ढों के साथ जीवन की आखिरी लड़ाई लड़ते नज़र आते हैं. फर्स्ट गियर में रेंगती गाड़ियां अपनी प्राण रक्षा की भीख मांग रही हैं. बरसाती पानी के नीचे नगर निगम ने कहां लैंडमाइन बिछाई है, किसी को कुछ नहीं पता. बस एक गलत कदम और आप महीनों तक अस्पताल की पीड़ा से दो चार हो सकते हैं.

पटना में फुटपाथ और ओवरब्रिज के नीचे सोने वाले लोग, गांधी मैदान में खुले आसमान के नीचे सोने वालों, दिन भर रिक्शा चलाने और रात में उसी पर सो जाने वालों का सावन बेहद दुखदायी है. रोज—कमाने खाने वाले गरीब पेड़ के नीचे खड़े होने का खतरा नहीं ले सकते. जाने कब डाल टूटकर गिर जाए. परिवार समेत ऐसे लोगों का सावन पूरे दिन और पूरी रात बरसाती फुहार से बचाने वाली एक छांव ढूंढने में ही बीत रहा है. भीगते हुए भी डर लगा रहता है कि पता नहीं कब पुलिस का सिपाही डंडा लेकर उन्हें अहसास करवा दे कि यह जगह उनकी नहीं है, फिर कहां जाएंगे? सावन तो खैर उनका भी है, दुखदायी ही सही.

पहली बरसात में ही पटना सराबोर है. सूखे ताल—तलैया लबालब तो नहीं भरे हैं, पर पानीविहीन भी नहीं है. सूख चुके पेड़—पौधों को अब जीवन की उम्मीद जगने लगी है. झमाझम बारिश के बीच सचिवालय के पास रोज भुट्टा का ठेला लगाने वाली रमरतिया की बोहनी तो हो चुकी है लेकिन ग्राहक के इंतजार में उसके चूल्हे की आग ठंडी पड़ चुकी है. अब वह दुबारा आग नहीं सुलगाएगी. उसके चेहरे पर बारिश होने से निराशा है.

आदमी तो आदमी दूसरे जीव भी बारिश का मजा ले रहे हैं. दादुर शीतनिद्रा से जग चुके हैं और रात में जमकर दादरा की तान छेड़ चुके हैं। कुछ खिलंदड़ बेंग खुशी से सड़कों में पर हाइजंप की प्रैक्टिस कर रहे हैं. झिंगुर भी महफ़िल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। शाम को उन्हें अपनी वीणा के तार को ट्यून करना है. आज उनके लिए जश्न की रात होगी. संगीत के किसी अखिल भारतीय समागम की तरह उनकी महफिलें सजेंगी. तो फिर आप टर्र टों टर्र टों की सरगम के लिए तैयार हो जाइए. झींगुरों के साथ उनकी युगलबंदी का रियाज कुछ ही देर में आरंभ हो जाएगा. सांप बेहद गुस्से में है. उसके आशियाने में बाढ़ का पानी घुस चुका है और मनुष्य के रिहायशी इलाकों में स्थित राहत शिविरों में जाने का भय उन्हें जानलेवा लग रहा है. हेल्दी चींटे-चींटियाँ न जाने किस अज्ञातवास से निकलकर नए ठिकाने की तलाश में भटक रही हैं। सावन है तो क्या छिपकली को मांसाहार से कोई परहेज नहीं। मौका ए लंच-डिनर की ताक में वे अलर्ट मोड में आ चुकी हैं।

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Quote of the day: “If you're gonna burn a bridge behind you, make sure you've crossed it first.” 
― Quentin R. Bufogle



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