ज्वेलरी डिज़ाइनर बन अफरोज़ आलम दे रहे हैं लोगों को मुफ्त ट्रेनिंग |

-Iti Sharan

ज्वेलरी डिज़ाइन की कला ने अफरोज़ को एक नई ज़िन्दगी दी है। आज अफरोज़ की बनाई ज्वेलरी बिहार के साथ ही अन्य राज्यों में भी पहुंच रही हैं।

समस्तीपुर के एक छोटे से गांव माहेसिंधिया में रहने वाले अफरोज़ को आज ज्वेलरी डिज़ाइनर के रूप में पहचाना जाता है। अफरोज़ ने किसी संस्थान से कोई ट्रेनिंग भी नहीं ली है, मगर आज अफरोज़ न सिर्फ ज्वेलरी डिज़ाइन कर रहें है बल्कि अपने गांव के लोगों को ज्वेलरी डिज़ाइनिंग की ट्रेनिंग भी दे रहे हैं।

ज्वेलरी डिज़ाइन की कला ने अफरोज़ को एक नई ज़िन्दगी दी है। आज अफरोज़ की बनाई ज्वेलरी बिहार के साथ ही अन्य राज्यों में भी पहुंची हैं। अफरोज़ अक्सर अलग-अलग राज्यों में लगने वाले मेलों में अपना स्टॉल लगाते हैं। इन दिनों अफरोज़ ने पटना में लगे हस्तशिल्प मेले में अपनी डिज़ाइन किए गहनों का स्टॉल लगाया हुआ है।

अफरोज़ पिछले कई सालों से ज्वेलरी डिज़ाइन करने का काम कर रहे हैं। आज अफरोज़ का पूरा परिवार इस काम में लगा हुआ है। अफरोज़ का कहना है कि मुझे नहीं लगता कि मैं किसी बड़े संस्थान में पढ़े डिज़ाइनर से कम हूं। अफरोज़ कुछ अपने दिमाग से तो कुछ किताबों को देखकर नई-नई डिज़ाइन बनाते हैं। वे बताते हैं कि पूरे परिवार का दिमाग इसमें लगा रहता है।

1987 में आई बाढ़ में अफरोज़ का गांव भी बुरी तरह से क्षति ग्रस्त हो गया था। बाढ़ में अफरोज़ का कपड़े का छोटा सा व्यवसाय भी ख़त्म हो गया। अफरोज़ के सामने रोज़गार की एक बड़ी समस्या आ गई। अफरोज़ को न चाहते हुए भी दिल्ली जाना पड़ा। दिल्ली में अफरोज़ एक ज्वेलरी बनाने वाले के यहां काम करने लगे। कुछ दिनों के बाद अफरोज़ को लगा कि वह खुद इस ज्वेलरी को डिज़ाइन कर सकते हैं। इसी सोच के साथ अफरोज़ वापस अपने गांव आ गए।

अफरोज़ बताते हैं कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे इस तरह का कोई मौका मिलेगा। अपने गांव में मैंने यह काम शुरू कर दिया। उसके बाद एक दिन मुझे पटना के सिन्हा लाइब्रेरी में लगे मेले में स्टॉल लगाने का मौका मिला। उसके बाद से यह सिलसिला आगे चल पड़ा। आज मुझे भारत सरकार से हस्तशिल्प कलाकार का सर्टिफिकेट भी प्राप्त हो चुका है। अफरोज़ बताते हैं कि इस कला ने मुझे आत्मनिर्भरता तो दी ही है साथ ही मेरी आर्थिक स्थिति भी काफी मजबूत हुई है।

 

अफरोज़ पूरे गांव में अकेले ज्वेलरी डिज़ाइनर थे। अफरोज़ चाहते तो वे इस बाज़ार में एकाधिकार जमा सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका सोचना है कि कला को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। इसी सोच के कारण आज वे अपने गांव के लोगों को मुफ़्त में ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। कुछ लड़के इनसे ट्रेनिंग लेने के बाद खुद स्वतंत्र रूप में ज्वेलरी डिज़ाइन कर रहे है।

 

अफरोज़ चाहते हैं कि उनका बेटा भी इस कला को आगे बढ़ाये। अभी हाल ही में इनके बेटे ने हैंडलूम की ट्रेनिंग पूरी की है। अफरोज़ का कहना है कि मैं अब ज्वेलरी के साथ हैंडलूम का कारोबार भी खोलने की सोच रहा हूं।

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