जानिए विदेश में रहने वाले बिहारी कैसे मनाते हैं छठ पूजा

भगवान सूर्य की उपासना का महापर्व ,छठ , अब बस आने ही वाला है. सालभर बिहारियों को इस चार दिवसीय त्यौहार की कुछ उसी बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है, जैसे स्कुल के पहले दिन बच्चे को अपनी माँ के आने  प्रतीक्षा रहती है. आखिर हो भी क्यों ना , जो ख़ुशी बच्चे को अपनी माँ से लिपट कर होती है, ठीक वैसी ही ख़ुशी हम बिहारियों को कार्तिक महीने के आने से होती है. काम काज , पढ़ाई लिखाई या किन्ही और कारणों से राज्य छोड़ चुके बिहारी भले ही दिवाली में घर ना आएं, मगर छठ पर्व तो हम बिहार में गंगा मईया की गोद में ही मनाना पसंद करते हैं. 

अगर मानो छुट्टी न भी मिल पायी और हम बिहार न भी  आ पाए, तो हम बिहार को अपने पास बुला लाते हैं.  कैसे? यह तो आप अमेरिका में बसे उन बिहारियों से पूछिए जो शुन्य से भी नीचे गिरे तापमान में भी पोटोमैक नदी में पूरी श्रद्धा से सूर्य भगवान को पूजते हैं.  छठ की छटा तो बिहारवासी सिंगापूर के चंगी बीच पर अर्घ्य देते हुए भी बिखेरते हैं. जितने छठ के गीत आप बिहार में सुनते हैं, उतने ही गीत विदेश में भी दिवाली के बाद माहौल छठमय करते हैं. प्रख्यात लोकगायिका स्वस्ति पांडेय, जिन्होंने  कैलिफ़ोर्निया में रहकर भी अपनी भोजपुरी गायिकी से सबके दिलो में एक अलग पहचान बनाई है, अपने पति के साथ हर साल छठ का व्रत करती हैं. उनका कहना है की विदेशो में अपनों के बीच छठ का बहुत महत्व है.

 ख़ास बात तो ये है विदेश की सरकार भी इस महापर्व को  अपने देश से दूर रह रहे भारतीयों को अपनेपन की कमी महसूस नहीं होने देती है। छठ व्रतियों को पूरी लगन से बढ़ावा दिया जाता है ताकि भारतीय संस्कृति के इस अभिन्न पृष्ठ की पवित्रता का प्रचार प्रसार किया जा सके.

मगर कहते हैं न, जो स्वाद लस्सी में आता है, वैसा स्वाद कोल्ड-ड्रिंक्स में ढूंढने पर भी नहीं  मिलता है. भले ही हम पूरे तन मन से विदेश में अपनी मिटटी की खुशबु ढूंढें, मगर वो सूर्योदय के पहले ठंडी-ठंडी हवा में घाट जाने के कोलाहल की कमी तो पूरी नहीं हो सकती ना । 

कुछ भी कहें, बात की बात तो यही है ,कि छठ एकता और सौहार्द का त्यौहार है; अब यह एकता देशी और विदेशी की हो, या देशी भाई बहनों की हो. है तो एकता ही न?


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