जानिए भारत के पहले कार्डियोलॉजिस्ट की पूरी कहानी

रविश कुमार के फेसबुक वॉल से

डॉ श्रीनिवास आप कहानी बन कर मुझ तक आए, आपकी कहानी लोगों तक पहुंचा रहा हूं।

ताण्डव आइंस्टाईन समदर्शी। इस नाम से एक ईमेल कुछ समय के अंतर पर आ जाता था। सैंकड़ों मेल के बीच इस नाम पर ताज्जुब करते हुए कभी आगे बढ़ गया तो कभी बिना देखे डिलिट कर दिया। फिर भी ईमेल का आना बंद नहीं हुआ। एक दिन उस ईमेल में चला गया। अमरीका में रहने वाले समदर्शी जी भारत आने पर मिलना चाहते थे। फिर से ईमेल को नज़रअंदाज़ करने लगा। आख़िर कितने लोगों से मिल सकता हूं। कितनी समस्याएं और कहानियां सुन सकता हूं। मैं अपने एकांत को लेकर ज़्यादा ज़िद करने लगा हूं। मुझे इस तरह की सार्वजनिकता कभी पसंद नहीं थी। पर मेरे बस की बात नहीं थी। टीवी ने सारा उलट-पुलट कर दिया। अब कोई करीब आता है तो लगता है मेरा एकांत फिर से भंग हो रहा है। गुमनामी एक ख़्वाहिश भर रह गई है। दुनिया ही बदल गई है। मैं अपनी सीमा से बाहर नहीं जाना चाहता था लेकिन समदर्शी जी मेरी सीमा के भीतर आने को लेकर प्रतिबद्ध थे। मैंने एक दिन लिख ही दिया। जी आ जाइये।

पिछले मंगलवार को समदर्शी जी और उनकी पत्नी आए। मैं घड़ी की तरफ देख रहा था। समदर्शी जी ने बैठते ही समय का सदुपयोग करना शुरू कर दिया। वे सीधे अपनी कहानी पर आ गए। हर पंक्ति के साथ लगता था कि कहानी लंबी हो जाएगी। मैं घड़ी देखने लगता था। धीरे-धीरे मैंने घड़ी की तरफ देखना कम कर दिया और कहानी पर ग़ौर करने लगा। भारत के पहले कार्डियोलॉजिस्ट की कहानी से टकराने लगा। उन्हीं के बेटे हैं ताण्डव आइन्सटाईन समदर्शी। कई साल अमरीकी जीवन के बाद भी सरलता और विनम्रता ऐसी थी जैसे कभी गांव से बाहर ही न गए हों। समदर्शी जी ख़ुद भी हार्वर्ड से पढ़े हुए हैं। डॉक्टर हैं।

पिता का नाम भारत के पहले कार्डियोलॉजिस्ट का नाम है- डॉ श्रीनिवास। आज के समस्तीपुर के गढ़सिसाई गांव के रहने वाले थे। 1932 में समस्तीपुर के किंग एडवर्ड इंगलिश हाईस्कूल से आठवीं तक पढ़े। पटना साइंस कालेज आए। प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से 1944 में एम बी बी सी की पढ़ाई की। अब यह कॉलेज पीएमसीएच के नाम से जाना जाता है। स्वर्ण पदक हासिल किया। 1948 में एला लैमन काबेट फेलोशिप लेकर हार्वर्ड जाते हैं। वहां से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन, डॉक्टर ऑफ साइंस की डिग्री लेते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मैसेचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में आधुनिक ह्रदय रोग चिकित्सा विज्ञान के जनक डॉ पॉल डडले व्हाइट के साथ कार्डियोलॉजी सीखते हैं। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले डॉ श्रीनिवास पहले और आख़िरी भारतीय थे। डॉ श्रीनिवास अपने देश और अपने राज्य लौट आते हैं।

भारत में कार्डियोलॉजी स्पेश्यालिटी की स्थापना करते हैं। उस वक्त जो जनरल फिजिशियन होता था वही ह्रदय रोग का इलाज करता था। पीएमसीएच में नौकरी करने लगते हैं। जनरल वार्ड में ही ह्रदय रोगियों को रखा जाता था। एक दिन सभी को उठाकर खाली पड़ी इमारत में रख देते हैं। यह इमारत संक्रमण रोग के मरीज़ों के लिए बनकर तैयार थी। अगले दिन पीएमसीएच में हंगामा मच गया। डॉ श्रीनिवास को चेतावनी दी गई कि आप सरकार की नौकरी कर रहे हैं। आपने कायदा तोड़ा है। वे नहीं माने।

अंत में उसी बिल्डिंग में भारत का पहला कार्डियोलॉजी सेंटर बनता है। अलग से। डॉ श्रीनिवास इंदिरा गांधी से मिलने जाते हैं। उनसे पत्र लेकर आते हैं कि इस संस्थान का नाम उनके नाम पर रखे जाने पर प्रधानमंत्री को कोई आपत्ति नहीं है। इंदिरा गांधी अनुमति दे देती हैं। उनके जीते जी यह पहला संस्थान जो उनके नाम पर बना था। इंदिरा गांधी ह्रदय रोग संस्थान आज भी है।

जब समदर्शी जी ने बताया कि भारत में सबसे पहले ईसीजी मशीन डॉ श्रीनिवास ही लेकर आए। मेरे अंदर इतिहास की कौतुलहलता करवट लेने लगी। मैं उस मशीन की तस्वीर देखना चाहता था। उसके पहले भारत में डाइरेक्ट राइटर इसीजी मशीन नहीं थी। डॉ श्रीनिवास अमरीका से अपने साथ लेकर आए थे। इस मशीन से जवाहर लाल नेहरू, नेपाल नरेश किंग महेंद्र, डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ कृष्ण सिंह, डॉ ज़ाकिर हुसैन का इलाज किया गया है। मेरे पास वो तस्वीर है और आपके साथ भी साझा कर रहा हूं।

डॉ श्रीनिवास ने फोरेंसिक साइंस में ईसीजी के इस्तमाल पर शोध किया और एक मॉडल बनाया जो आज भी दुनिया भर में फोरेंसिक साइस की पढ़ाई में इस्तमाल होता है। इसे “The EV Method of Identification” कहते हैं। यहां से फोरेंसिक साइंस में उंगलियों के निशान के अलावा ईसीजी का इस्तमाल होने लगता है। इंग्लैंड की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस इस तरीके का आज भी इस्तमाल करती है।

डॉ श्रीनिवास ने ह्रदय रोग की चिकित्सा में योग का प्रयोग किया। मुंगेर स्कूल के स्वामी सत्यानंद सरस्वती का सहयोग लिया। योग से रक्च चाप को नियंत्रित करने पर काम किया। बिहार में yoha research institute of India की स्थापना की।

धर्म और साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। डॉ श्रीनिवास की स्मृति में भारत सरकार ने 2017 में एक लिफाफा भी जारी किया है। इस लिफाफे पर उनकी तस्वीर है। ईसीजी मशीन की तस्वीर है। उस पर लिखा है डॉ श्रीनिवास- भारत के पहले ह्रदय रोग विशेषज्ञ।

अब मेरा ध्यान घड़ी की तरफ़ जाने लगा। रात का 9 तो 9 बजे ही बजता है। मैं अचानक खड़ा हो गया। माफ कीजिएगा। समय बहुत कम है। इसके बाद जानलेवा दबाव बन जाता है। समदर्शी जी ने कुछ भी अतिरिक्त आग्रह नहीं किया। वे चुपचाप उठे और चले गए। घड़ी तलवार लेकर खड़ी थी। शर्मिंदा होने के लिए भी वक्त नहीं था। मैं मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में 100 बच्चों की मौत पर रिपोर्ट तैयार करने लगा। बीच-बीच में ख़्याल टकराने लगा कि कितना शानदार इतिहास रहा है बिहार का चिकित्सा में। कितना शर्मनाक वर्तमान है बिहार का चिकित्सा में।

बहुत शुक्रिया समदर्शी जी। आप चल कर आए। आपने इतनी शानदार कहानी बताने के लिए इतनी मेहनत की। हफ्तों ईमेल किया। यह कहानी सिर्फ आपके पिता की नहीं है। भारत के चिकित्सा इतिहास की है।

Source- ये जानकारी रविश कुमार जी के फेसबुक वॉल से ली गई है.


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