हम सब के रेणु

 गिरीन्द्र नाथ झा

रेणु अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन खेत में जब भी फ़सल की हरियाली देखता हूं तो लगता है कि रेणु हैं, हर खेत के मोड़ पे। उन्हें हम सब आँचलिक कथाकार कहते हैं लेकिन सच यह है कि वे उस फ़सल की तरह बिखरे हैं जिसमें गाँव-शहर सबकुछ समाया हुआ है।

रेणु को जब भी याद करता हूं, उनका परमहंस के प्रति श्रद्धा भाव और लेखन के प्रति अटूट विश्वास उनके और क़रीब ला खड़ा कर देता है। रेणु का यह संस्मरण हम सबको पढ़ना चाहिए- “१९५२ में टी.बी. । एकदम अंतिम घड़ी थी। आसमान पर बादल। न पानी बरसता था और न बदली छंटती थी। गुमस ! नल बंद हो गया। पानी के लिए लोग चिल्ला रहे थे। तभी बिजली चली गई। घुप्प अँधेरा। फिर कुछ जलाया गया। किसी तरह मैंने सुराही की तरफ हाथ बढ़ाया ! वह गिर गया। पानी छितर गया। एक रोगी घिसट कर आया और पानी चाटते – चाटते समाप्त हो गया। मुझे लगा मर तो रहा हूं लेकिन इतना कुछ जो मेरे भीतर है, उसका क्या होगा ? क्या सब यों ही निरर्थक चला जाएगा ?

तभी एक दाढ़ी वाला पागल जैसा आदमी सामने आ जाता है। ठहाका लगाता है। बंगला बोलता है – “ तुमने सोने की क़लम ( पार्कर ५१) से मेरा नाम कितनी बार लिखा है? “ मैं सोचता हूँ कि यह कौन है ? फिर वह गाँजे का धुआँ मेरे मुँह पर फेंककर कहता है – “ दूर साला, तोमार किच्छु हयनि ! तुमि भालो…” और वह ग़ायब हो जाता है।

दूसरे दिन से ही मैं प्रगति करने लगता हूं, अच्छा होकर जब अस्पताल से निकलता हूं तो सबसे पहले एक किताब की दुकान पर जाता हूं।

दुकानदार बंगला की एक किताब मेरे सामने फेंक देता है। बहुत सुंदर आवरण है। खोलता हूं तो वही बूढ़ा….एकदम वही। मगर ये तो परमहंस हैं। फिर आस्था, विश्वास। मेरा दीक्षित होना और लिखना ‘मैला आँचल’ ।

यही लेखन और भाव रेणु को ‘देहातीत’ बनाता है।उनका कथा संसार आँचलिक भी है और शहराती भी । यही कारण है कि रेणु आँचलिक होकर भी स्थानीय नहीं रह जाते।खेती-बाड़ी करते हुए इस कथाकर-कलाकार से मुझे अक्सर भेंट होती है, आप इसे मेरा भरम मान सकते हैं लेकिन जब भी रोज की डायरी लिखने बैठता हूं तो लगता है वे खड़े हैं सामने। छोटे-छोटे ब्योरों से लेखन का वातावरण गढ़ने की कला उनके पास थी। रेणु को पढ़ते हुए गाँव को समझने की हम कोशिश तो कर ही सकते हैं।

परती परिकथा का परानपुर कितने रंग-रूप में रेणु हमारे सामने लाते हैं। गाँव की बदलती हुई छवि को वे लिख देते हैं। वहीं मैला आँचल का मेरीगंज देखिए। हर गाँव की अपनी कथा होती है, इतिहास होता है। इतिहास के साथ वर्तमान के जीवन की हलचल को रेणु शब्दों में गढ़ देते हैं। गाँव की कथा बाँचते हुए रेणु देश और काल की छवियाँ सामने ला देते हैं।

एक पाठक के तौर पर रेणु की कृति ‘परती परिकथा’ मुझे सबसे अधिक पसंद है। दरअसल इस किताब में ज़िंदगी धड़कती है। इस कथा का हर पात्र मुझे नायक दिखता है। भवेश, सुरपति, मेरी, ताजमनी, जितेंद्र ..इन सबकी अपनी-अपनी दृष्टियाँ हैं । कथा के भीतर कथा रचने की कला रेणु के पास थी। कथा में वे मन की परती तोड़ते हैं, यही मुझे खींच लेती है। दरअसल खेती करते हुए हम यही करते हैं, परती तोड़ते हैं।

परती परिकथा में सामाजिक संबंधों में बदलाव के कई प्रसंग आते हैं। मलारी और सुवेश का प्रेम मुझे सबसे क़रीब दिखता है। प्यार की जाति नहीं होती है। लेकिन समाज का तानाबाना उन्हें परेशान करता है और दोनों गाँव छोड़कर भाग खड़े होते हैं। गाँव का तमाम जीवन कुछ संस्थाओं और तथाकथित संस्कारों से बँधा होता है। जातियाँ ऊँची हो या नीची , सभी समान जड़ता के शिकार हैं।

निर्मल वर्मा रेणु को संत मानते थे। उन्होंने लिखा है कि जिस तरह साधु संतों के पास बैठकर ही असीम कृतज्ञता का अहसास होता है, हम अपने भीतर धुल जाते हैं, स्वच्छ हो जाते हैं, रेणु जी की मूक उपस्थिति हिंदी साहित्य में कुछ ऐसी ही पवित्रता का बोध कराती है। वहीं रेणु जैसे महत्वपूर्ण कथाशिल्पी का पत्रकार होना अपने आप में एक रोचक प्रसंग है। उन्होंने अपने रिपोतार्जों के जरिए हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया है।

एकांकी के दृश्य‘ पुस्तक में उनके रिपोर्जों को संकलित किया गया है। उन्होंने बिहार की राजनीति, समाज-संस्कृति आदि को लेकर पत्रिकाओं के लिए स्तंभ लेखन किया था।

चुनाव लीला- बिहारी तर्ज ‘ नाम से रेणु की एक रपट 17 फरवरी 1967 को प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने लिखा था- “पत्र और पत्रकारों से कोई खुश नहीं है। न विरोधी दल के लोग और न क्रांगेस-जन। एक पत्र को विरोधी दल की सभा में मुख्यमंत्री का पत्र कहा गया। और उसी पत्र के पत्रकार को मुख्यमंत्री के लेफ्टिनेंट ने धमकियां दीं। मुख्यमंत्री को शिकायत है कि पत्रकार उनके मुंह में अपनी बात पहना देते हैं। अ-राजनीतिक लोगों का कहना है कि चुनाव के समय पत्रकारों की पांचों ऊंगलियां घी में रहती हैं…।

राजनीति के इस वाद-विवाद काल में रेणु की यह बात मुझे बार-बार किसानी में लगे रहने लिए प्रेरित करती है-

” सुन रे मानुष भाई,

सवार ऊपर मानुष सत्य

ताहार ऊपर किछु नाईं “

सोचिए, मैला आँचल और परती परिकथा का लेखक यदि इस भाषा में हमें समझा रहा है तो जान लीजिए आज भी हम आशाओं -आकांक्षाओं में बीच निराश और हताश हैं और इन सबसे मुक्ति के लिए हमें लड़ना होगा। वे प्रतिबद्धता का अर्थ केवल मनुष्य के प्रति प्रतिबद्धता से समझते थे।

रेणु अपने साथ गाँव लेकर चलते थे। इसका उदाहरण ‘केथा’ है। वे जहाँ भी जाते केथा साथ रखते। बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में पुराने कपड़े से बुनकर बिछावन तैयार किया जाता है, जिसे केथा या गेनरा कहते हैं। रेणु जब मुंबई गए तो भी ‘केथा ‘ साथ ले गये थे। दरअसल यही रेणु का ग्राम है, जिसे वे हिंदी के शहरों तक ले गए। उन्हें अपने गाँव को कहीं ले जाने में हिचक नहीं होती थी। वे शहरों से आतंकित नहीं होते थे। रेणु एक साथ देहात -शहर जीते रहे, यही कारण है कि मुंबई में रहकर भी औराही हिंगना को देख सकते थे और चित्रित भी कर देते थे। रेणु के बारे में लोगबाग कहते हैं कि वे ग्रामीणता की नफ़ासत को जानते थे और उसे बनाए रखते थे। मेरे बाबूजी अक्सर चिकनी मिट्टी से जोड़कर रेणु की व्याख्या करते थे। वे कहते थे कि मिट्टी जब गिली होती है तब वह मुलायम दिखती है लेकिन जैसे ही तेज़ धूप और हवा में सूख जाती है तब माटी भी आवाज़ देने लगती है, यही रेणु का साहित्य है।

आज रेणु शब्द लिखते ही मन के भीतर गीत बजने लगता है। दरअसल उनके नाम में ही कविता है, एक गूँज है, एक संगीत है। उनके भीतर राजनीति का भी एक अलग अध्याय था। उनकी राजनीति मैला आँचल की है, जिसे सफ़ेदपोश लोग शायद ही समझ पायें।

रेणु के साहित्य में डूबे रहने की आदत से ही पता चला कि मनुष्य की आकृति, रूप-रंग, बोलचाल, उसके व्यक्तित्व की वास्त्विक कसौटी नहीं है और न हीं बड़ी-बड़ी इमारतों से देश की प्रगति मापी जा सकती है। दरअसल बहुत बार जिन्हें हम भद्दा और कुरूप समझते हैं, उनमें मनुष्यता की ऐसी चिनगारी छिपी रहती है, जो भविष्य को भी जगमग कर सके। जैसा मैला-आंचल में रेणु ने बावनदास जैसे चरित्र को पेश किया। उपन्यास में बावनदास की मौत पर रेणु की मार्मिक टिप्पणी की है-“दो आजाद देशों की, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ईमानदारी को, इंसानियत को बावनदास ने बस दो ही डगों में माप लिया।

 

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Quote of the day:“Don't be afraid of death; be afraid of an unlived life. You don't have to live forever, you just have to live.” 
― Natalie Babbitt, Tuck Everlasting

 

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