पटना के वो दिन-यादों की कलम से।


सात साल हो गए हैं घर को छोड़े हुए। छोड़ने की वजह – पढाई ,नौकरी ,ट्रेनिंग इत्यादि । इन्ही चक्करों में एक शहर से दुसरे शहर भटकती रही हूँ। लगता है ज़िन्दगी का अच्छा ख़ासा हिस्सा बिता दिया है करियर बनाने की राह में । मंजिल अब करीब ही हैं १ साल बाकि है जो सदियों सा लम्बा लगता है । सच कहूँ तो अगर अपने राज्य में साधन और अवसर होते तो कभी नही जाती अपनी जगह ,अपने लोगों को छोड़ कर । और शायद हर कोई यही चाहता है ।पर क्या करें बेहतर भविष्य की चाह में अपने वर्तमान का बलिदान दे देना मनुष्य का स्वभाव ही है शायद।
मेरे जीवन के इन सात सालों का सबसे खूबसूरत हिस्सा वो रहा है जो सौभाग्यवश पटना में बीता है। राजधानी में बैठी हूँ और पटना आ रही हूँ ,ऐसे में इन यादों का ताज़ा होना वाजिब है और खुशनुमा भी। तक़रीबन छः महीने थे जो दो हिस्सों में बटे हुए थे । उन दिनों में मैंने इस शहर या यूँ कहूँ तो पटना सिटी को बहुत करीब से देखा है । न जाने क्यों ये अपनापन किसी और शहर में दोस्तों के होते हुए भी नहीं मिला जो यहाँ अकेले रह कर मिलता था । बोरिंग रोड पर वो फल वाले अंकल , वो गली के दूध वाले अंकल , वो सब्जीवाले जो मंदिर के आगे बैठा करते थे , जाने क्यों सब के सब आज भी अपने से लगते हैं। मैं हर रोज़ नए नए रास्तों से वापस आती थी, कभी खोने का डर ही नहीं लगा पर दूसरे शहरों में जहाँ भी रही हूँ मजाल है जो किसी नयी जगह अकेली चली जाऊं ।

मैं बोरिंग रोड के एक हॉस्टल में रही थी और वहां रहते रहते एक बड़े भाई की कमी भी पूरी हो गयी। होस्टल के संचालक सुशांत भैया के रूप में एक बड़ा भाई मिल गया जिनसे खून के रिश्तों से भी ज्यादा स्नेह मिला। आज भी उनसे बात करूँ तो लगता ही नहीं की हमारा कोई रिश्ता नहीं है, वही प्रेम ,वही चिंता। क्या कहूँ।

कहने को तो पटना सिटी है, पर यहाँ दूसरे महानगरों की तरह बेचैनी नहीं है , लोग भागते जरुर होते हैं पर बेचैनी में नहीं , मस्ती में। गाड़ियों में रेडियो मिर्ची वाली अंजलि की बातें और झा जी के किस्से सुनते लोग ट्रैफिक जाम में हॉर्न बजा कर सर दुख देने वाला शोर नहीं मचाते , बल्कि गाडी से उतर कर आगे वाले से लड़ पड़ते हैं , और बाकि लोगों का मुफ्त में मनोरंजन हो जाता है। और जब अचानक से जाम खुल जाए तो आसपास के लोगों को ऐसे देखते हैं जैसे उन्होंने ही तो खुलवाया है जाम ,लड़ कर।

एक बड़े चौराहे पर महिला ट्रैफिक पुलिस को देखकर क्या बताऊँ कितनी ख़ुशी होती थी जिसे मैं मन में ऐसे बयां करती थी- देखो कैसे एक औरत के इशारे पर सैकड़ों गाड़ियाँ रुक जाती हैं, और उसके एक इशारे पर चल पड़ती हैं। गज़ब का आत्मविश्वास दिखता था उस महिला की भाव भंगिमा में। गली से निकलते ही ऑटो वाले चलने के लिए इशारा करते, एक दिन निकली तो एक महिला ने इशारा किया मैं सीधा उसकी ऑटो में जा बैठी। रास्ते भर पुरुष ऑटो चालकों को कुछ इस तरह देखा जैसे सब को दिखा रही हूँ –ये देखो मेरा ऑटो कौन चला रहा है। उस महिला को ज्यादा पैसे भी दिए और कहा –“बड़ी ख़ुशी हुई आपको ऑटो चलाते देख कर “। वो बेचारी शरमा गयी । मैं भी क्या करती ? पटना में होने वाली हर बात पर्सनल जो लगती थी।

हर सप्ताहांत पर हेरिटेज में जाकर कथादेश , ज्ञानोदय ,वागर्थ खरीदना और रविवार के दिन उनकी कहानियों में कल्पना के गोते लगाना । सचमुच उन खूबसूरत लम्हों को फिर से जीने का मन करता है।मेरे प्यारे पटना ,कहीं भी भाग लूं मंजिल तो तुम ही हो मेरी।

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