इंग्लिश मार्केट पटना का पहला सुपर बाजार था

आज यह कल्पना करना भी अजीब लगेगा कि पिछली सदी के दूसरे-तीसरे और चौथे दशकों में पटना का एक ही इंग्लिश मार्केट एक बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करता रहा था.

बंगाली चित्रकार सीताराम की 1814 में बनाई पटना सिटी चौक की एक तस्वीर। वाटर कलर में बनी यह तस्वीर ब्रिटिश लाइब्रेरी में संग्रहित है।

पाटलिपुत्र के नाम से विख्यात प्राचीन पटना की स्थापना 490 ईसा पूर्व में मगध सम्राट अजातशत्रु ने की थी. कालांतर में पाटलिपुत्र मगध, नंद, मौर्य, शुंग, गुप्त और पाल साम्राज्यों की राजधानी बनी. गंगा किनारे बसा पटना दुनिया के उन सबसे पुराने शहरों में से एक है जिनका एक क्रमबद्ध इतिहास रहा है. मौर्य काल में पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र बन गया था. विदेशी पर्यटक और यात्री कौतूहल के साथ पटना आते. उनके संस्मरणों में तत्कालीन पटना सजीव हो उठता है. लेखक और पत्रकार अरुण सिंह की पुस्तक (पटना- खोया हुआ शहर) में पटना को लेकर कई रोचक जानकारियां मिलती है. प्रस्तुत है इस पुस्तक का एक अंश-

बीते कुछ वर्षों में पटना ने बड़ी तेजी से तरक्की की है. कई नई इमारते बनीं. नए होटल खुले. बड़े-बड़े मॉल बने. रोज खुल रही नई दुकानों में ग्राहकों की भीड़ जुटी रहती है. पटना का भूगोल बड़ी तेजी के साथ बदलता जा रहा है. आज यह कल्पना करना भी अजीब लगेगा कि पिछली सदी के दूसरे-तीसरे और चौथे दशकों में पटना का एक ही इंग्लिश मार्केट एक बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करता रहा था.

पटना में गोल मार्केट या म्युनिसिपल मार्केट तो नहीं इंग्लिश मार्केट का नाम विस्मित करने वाला लग सकता है. किंतु इसका अस्तित्व आज भी है, हालांकि इसका अब ज्यादा प्रचलित नाम बूचड़खाना है. न्यू मार्केट के शोरगुल और भीड़ भरी सड़क के पीछे कबाड़खानों के बीच भले ही यह आज उपेक्षित है, किंतु इसका एक स्वर्णिम युग भी रहा है. लाल ईंटों और लाल टाइलों की छत वाली यह इमारत कोलोनियल इंडिया की यादों को ताजा करती हैं. इसका वास्त्तुशिल्प मुंबई के क्रैफोड मार्केट की तरह है. इंग्लिश मार्केट का निर्माण 1920 ई. के आसपास हुआ था. तब पटना में अंग्रेजों के साथ यूरोपियनों की भी एक बड़ी आबादी रहती थी. ये लोग पटना के पश्चिम (अब का मध्य पटना) में रहते थे. ऐसे में इस मार्केट का निर्माण उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ था. लेकिन हिन्दुस्तानी भी इस बाजार में खरीदारी कर सकते थे. आजादी के काफी दिनों बाद तक यह मार्केट व्यवस्थित रहा. सत्तरवें दशक से यह उपेक्षित होता चला गया.

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इस इंग्लिश मार्केट के स्वर्णिम दिनों के एक ग्राहक निताई राय ने एक बातचीत में पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया था. तब इस मार्केट के चारों तरफ खूबसूरत बगीचा हुआ करता था. उसमें विभिन्न रंगों के गुलाब थे. चार माली बगीचे की देखभाल में शाम तक लगे रहते थे. यह तब खुला-खुला सा था. इतनी इमारतें नहीं बनी थीं. पटना की इतनी आबादी भी नहीं थी. तब यहां पहुंचने के छह रास्ते थे. सड़क से भी चार रास्ते यहां तक पहुंचते थे. एक वहां से जहां लोहिया जी (वहां अब यह नहीं है, वहां फ्लाईओवर बन रहा है) की मूर्ति है, दूसरा साधना औषधालय के सामने, तीसरा रास्ता सर्चलाइट प्रेस के बगल से और चौथा रास्ता पॉल होटल (यह भी अब नहीं रहा) की तरफ से.

निताई आगे बताते हैं, ‘सुबह दस बजे से बारह बजे के बीच बाजार में खूब भीड़ रहती थी. अंग्रेज साहब, उनकी मेम के साथ-साथ हम हिन्दुस्तानी, सारे लोग यहां आते थे. इस दो घेटे के अंदर खूब बिक्री होती थी. बाजार में सबसे पहले मछली का काउंटर था. इसके बाद बकरे के मांस का. पोर्क और बीफ का भी अलग काउंटर होता था, जहां हम हिंन्दुस्तानी नहीं जाते थे. बीच के गोलंबर में सब्जियां बिकती थीं और उसके चारों तरफ ग्रोसरा (किराना) की दुकानें थीं. एक रास्ते के दोनों तरफ मक्खन और ब्रेड की दो दुकानें हुआ करती थीं, जहां अंग्रेज मेम साहिबोंं की भीड़ लगी रहती थी. दक्षिण वाले हिस्से में पहुंचने पर मुर्गी बाजार मिलता था.’

अब इंग्लिश मार्केट बूचड़खाने में तब्दील होकर रह गया है, जहां शहर के बड़े होटलों के कर्मचारी बकरे और मुर्गे का मांस खरीदते नजर आते हैं.

(‘पटना खोया हुआ शहर‘ पुस्तक और News18 से साभार)

 


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