गउरा एतना तपवा कयिलु, तू बउरहवे लागी ना | एक कविता बिहार से

गउरा एतना तपवा कयिलु, तू बउरहवे लागी ना|
बउरहवे लागी ना हो बउरहवे लागी ना||
इनका दुअरवा गउरा सूपवो ना दउरा,
हो बउरहवे लागी ना||
गउरा एतना तपवा कयिलु, तू बउरहवे लागी ना|

सावन का महीना हो, सोमवारी का पर्व हो, तीज का पर्व हो या महाशिवरात्री, भोले बाबा के नाम पर महिलाएँ जब भी इकट्ठी होती हैं, कुछ पारंपरिक गीतों के स्वर से माहौल एकदम हरा-भरा हो जाता है| माँ जब तीज में ये गीत गाती है तो मैं या कोई भी शायद ही सोचता होगा कि ये आखिर लिखी किसने है! इस गीत और इसकी तरह न जाने कितने गीतों के मूल रचयिता का नाम है श्री महेंद्र मिश्र| भिखारी ठाकुर के बाद श्री मिश्र का नाम भोजपुरी साहित्य के चरम पर स्थापित रचनाकारों में आता है | 1876 ई० में मिश्रवलिया(छपरा), बिहार में जन्में श्री महेंद्र मिश्र जी 28 सितम्बर 1946 ई० तक जीवित रहे| ये मुख्यतः भक्ति और आध्यात्मिक गीत लिखते थे, ऐसे गीत जो संस्कारों, परम्पराओं, लोकगीतों में रच-बस गये हैं|
पटनाबीट्स पर ‘एक कविता बिहार से’ में आज प्रस्तुत है समाज को गीतों के अविश्मरणीय भेंट देने वाले रचनाकार की एक भोजपुरी कृति| जीवन की सच्चाई बयाँ करती ये पंक्तियाँ जीवन में उतारने योग्य भी हैं|

मुट्ठी बाँध आए, कुछ नेकी ना कमाए

मुट्ठी बाँध आए, कुछ नेकी ना कमाए,
माया में लुभाए तुम भरमें हो कहाँ-कहाँ|
दुष्टन संग बैठ-बैठ निनदा के खजाना कियो,
पापन की बोझ रही जइहो तू जहाँ-जहाँ|
बनके अभिमानी तू नादानी नहीं छोड़े मूढ़,
अबका करोगे अब तो जाना है वहाँ-वहाँ|
द्विज महेन्द्र मूँद गईं आँखें तब लाखें कहाँ,
घोड़े रथ पालकी, सब रह गई जहाँ-तहाँ|

Comments

comments