आशना थे कभी, जा बैठे हैं अनजानों में | एक कविता बिहार से

कुछ बात है ऐसी जो कही ही नहीं जाती,
छुप बैठी है आँखों में नमी ही नहीं जाती|
ख़ामोश रह, इज़हार न कर अपने ग़मों का,
फ़रियाद ग़रीबों की सुनी ही नहीं जाती|

ये पंक्तियाँ लिखीं हैं संजय कुमार कुंदन जी ने| श्री कुंदन जी ‘जन शिक्षा बिहार’ के उप निदेशक का पद संभाल चुके हैं| सरकारी पद सम्भालते हुए भी गर्व इस बात का करते हैं कि भावनाएं पन्नों पर उतार पाने की कला है इनके पास, कि कलमकार हैं ये| कविता और गज़ल लिखते हैं| पटना में रहते हैं और कवि मंचों पर अक्सर आना-जाना रहता है| संजय कुंदन जी की गजलों में उर्दू के शब्दों का बड़े सलीके से इस्तेमाल होता है| 7 जनवरी 1955 में जन्में श्री कुंदन जी फारबिसगंज, अररिया से ताल्लुक रखते हैं|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ में आज प्रस्तुत है श्री संजय कुमार ‘कुंदन’ जी की दो ग़ज़लें और साथ में कुछ कठिन शब्दों के अर्थ|

ग़ज़ल 1

हम तो पहुँचे भी नहीं उनके तरबख़ानों में,
ज़िक़्र होने लगा कैसे भला अफ़सानों में|
ज़िन्दगी हम तेरी मजलिस के गुलूकार नहीं,
हमने गाए हैं तराने यहाँ वीरानों में|
छोड़िए,छोड़िए, किस बात की तल्ख़ी उनसे,
आशना थे कभी, जा बैठे हैं अनजानों में|
अब असासा नहीं, कासा नहीं, चादर भी नहीं,
आग ख़ुद हमने लगाई यहाँ अरमानों में|
मेरे ज़ख़्मों पे करम ख़ूब था ग़मख़्वारों का,
अब तो कुछ भी न बचा उनके नमकदानों में|
कौन समझेगा सफ़र क़ुदरती फूलों का यहाँ,
काग़ज़ी फूल ही अब सजते हैं गुलदानों में|
तख़्त पे गर न हो तो दार पे होगा ‘कुन्दन’,
तुम न पाओगे उसे शाह के दरबानों में|

तरबख़ाना- आमोदगृह,
गुलूकार- गायक, तल्ख़ी- तिक्तता, आशना- परिचित, असासा- घर-गृहस्थी का सामान, कासा-भिक्षापात्र,नमकदान- नमक का डिब्बा, तख़्त- राजसिंहासन, दार- सूली, शाह- राजा.

ग़ज़ल 2

क्या कहते हैं? दुनिया में शराफ़त नहीं कोई,
या आपकी आँखों में मुरव्वत नहीं कोई|
हाँ, कुछ न कुछ तक़दीर ने रखा है भरम भी,
ख़ुशबख़्त हों वैसी भी अलामत नहीं कोई|
सर अपना झुका दें ये कहे हमको ज़रुरत,
और दिल ये कहे इसकी ज़रुरत नहीं कोई|
बैठे हुए हैं और तसव्वुर है सफ़र पे,
कश्ती है रवाँ ज़ाहिरी हरकत नहीं कोई|
ज़िन्दा रहें तो सुब्ह के सूरज को भी देखें,
इसके सिवा हमारी मशक़्क़त नहीं कोई|
उलझे रहें हक़ीर मसाइल में सुब्हो-शाम,
ता ज़िन्दगी ये तय है के राहत नहीं कोई|
दो गज़ ज़मीं भी नाम से ‘कुन्दन’ के लिखाते,
जागीर लिखाने की तो हसरत नहीं कोई|

ख़ुशबख़्त- भाग्यशाली, अलामत- लक्षण, तसव्वुर- कल्पना, रवाँ- गतिशील, ज़ाहिरी- प्रत्यक्ष, हक़ीर- तुच्छ, मसाइल- समस्याएँ.

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