मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई | एक कविता बिहार से

महीने की आख़िरी कविता तक का सफ़र तय कर चुके हैं हम और नियम के अनुसार आज की कविता नेहा नूपुर की तरफ से होगी| पटनाबीट्स के एक कविता बिहार से में इनकी पुस्तक ‘जीवन के नूपुर’ से एक भोजपुरी कविता आज आपके सामने प्रस्तुत हो रही है|
कविता का विषय ऐसे अप्रवासी बिहारियों के लिए एक संदेश है, जिनके रग-रग में बिहार बसता है, अपनी मातृभूमि से प्रेम बसता है| बिहार सिर्फ एक राज्य का नाम नहीं है, ये कई धर्मों का संगम स्थल है| ये विचारों का मिलनस्थल है| ये गंगा माँ की पावन धरती है| यहाँ की संस्कृति के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डालती ये कविता आज ‘एक कविता बिहार से’ में, जिसका शीर्षक है- ‘मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई’|

मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई

गाँव-घर से मिलल संस्कार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

दुई-चार दिन तनी घरहूँ बितईहऽ,
इहवाँ के खुसबू पूरा देस में फइलइहऽ|
माटी के दीहल अधिकार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

जाई के बिदेस, देस के बोली जनि भुलइहऽ,
लईकन के माई-बाबू कहे के सिखइहऽ|
जरि जाई देंहिया बाकिर बेवहार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

गंगा के घाट, गुल्ली-डंटा के खेला,
हर साल लागे इंहा सोनपुर मेला|
एह सभ में रमल तोहार पेयार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

सिंगापूर-अमेरिका में छठी माई के पूजन,
एके साथे होखे कुआरे पितरि अरपन|
एहिजा के तीज-त्योहार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

नस-नस में रसल बिचार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई||

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