धूप में नहा कभी | एक कविता बिहार से


आफताब अहमद
जी बिहार के गया जिले के निवासी हैं| लघु-कथाएं और ग़ज़लें तो लिखते ही हैं, उपन्यास भी लिख चुके हैं| शिक्षक हैं और अपनी हालिया प्रकाशित इंग्लिश उपन्यास ‘A book in her hand’ के जरिये लड़कियों की शिक्षा पर प्रकाश डालने की कोशिश कर चुके हैं| उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित होती आयीं हैं और भविष्य में ग़ज़लों की किताब लाने की ही तैयारी भी है|
बहरहाल, ‘पटनाबीट्स’ पर एक कविता बिहार से के लिए उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल सौंपी है जिसे हम सीधे आप तक पहुँचा रहे हैं|

ग़ज़ल

ज़िंदगी है ज़िंदगी, इसे गले लगा कभी।
चाँदनी में आ, निकल धूप में नहा कभी।

ख़ाक छानते रहे उम्र भर कहाँ-कहाँ।
गाँव के सुकून में एक पल को आ कभी।

दिल में हो अगर खुशी हँसते हैं सभी मगर।
बात मेरी मान ले, ग़म में मुस्कुरा कभी।

ढूंढते हो क्या मुझे मेरा कोई घर नहीं।
बस गए खयाल में, दिल में रह लिया कभी।

बात मेरे खून की होगी हर ज़ुबान पर।
तेरी खुशियों का दीया जो नहीं बुझा कभी।

कुछ तो कर खुशामदें, झूठी कुछ खुशी तो दे।
लफ्ज का फरेब दे, चाँद तोड़ ला कभी।

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