भीष्म गंगा का पुत्र है | एक कविता बिहार से

गौतम वसिष्ठ जी कर्नाटक में रहते हैं| मुख्यतः बिहार से हैं, यहीं पले-बढ़े| लखीसराय जिले के बल्गुदार गाँव में इनका जन्म हुआ| हिंदी, इंग्लिश और रसियन साहित्य पर पकड़ रखते हैं और इन तीनों ही भाषाओं में कविता लिखना पसंद करते हैं| ये थिएटर आर्टिस्ट भी हैं और विश्वविद्यालय स्तर पर कविता से जुड़े कार्यक्रम भी चलाते हैं| गौतम जी फ़िलहाल देश के प्रतिष्टित विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, के विद्यार्थी हैं|

एक कविता बिहार से’ के लिए इन्होंने अपनी कई खुबसूरत रचनाएँ भेजी हैं, जिनमें से कुछ रचनाएँ आपके साथ आज पटनाबीट्स के जरिये साझा की जा रही हैं| प्रस्तुत रचना में से पहली रचना जहाँ माया एंजेलस की इंग्लिश कविता ‘the Lesson’ से प्रेरित है और इसी का अनुवाद है, वहीं दूसरी रचना ‘भीष्म गंगा का पुत्र है’, गंगा और भीष्म की प्रकृति का बारीकी से निरिक्षण करती है|

 

कविता-1

रिसती रहती है मौत जहाँ
वहाँ जीने की हसरत और सही
है वहशी मेरा जीवन माना
थोड़ी सी वहशत और सही
टूट रहा है नस नस यूँ
जैसे टूटा हो कली अवलि दल
फूट रही हूँ रस रस यूँ
जैसे फूटे कहीं झरना जल
मेरी यादों के इस जेहन में
कुछ टूटे बिखरे मंदिर हैं
कुछ नरम गरम सा मांस भी है
जिसमें कुछ कीड़े अस्थिर हैं
ठंडी शिकस्त का ताना बाना
मेरे चेहरे पर दिखता रहता है
माथे पे झुर्री और लकीरें
वक़्त हरदम खींचता रहता है
सौ वाईस आये समझाने
फिरदौस की राहें दिखलाने
जीने की लत लगी है अब
कुछ देर अभी लत और सही
ये माना कि रिसती मौत यहाँ
पर जीने की हसरत और सही!

कविता-2

भीष्म गंगा का पुत्र है,
बुजुर्ग बताते हैं !
मैं मान लेता हूँ!
और मानूँ भी क्यों न?
माना कि मैंने भीष्म को नहीं देखा,
पर गंगा को तो देखा है|
गया हूँ उसकी आँचल में अपनी दादी की अस्थियाँ बहाने!
कर्क रोग से टूटी हुई,
हल्की और खोखली..
और उसी गंगा में मैंने देखा,
एक नन्ही बच्ची का शव ,
जो फूल कर बदनुमा हो गया था!
उसे पैदा होते ही गंभीर बीमारी
ने घेर लिया था!
बीमारी का नाम क्या था?
याद नहीं सही से नाम,
पर दुनिया या समाज,
कुछ तो ऐसा ही था!
और भी बहुत कुछ
बह रहा था नदी की धार में जो शुद्ध तो नहीं था!
और ऐसी ही कितनी गंदगी,
बसी पड़ी थी धरातल तक!
पर “गंगा” कुछ नहीं बोली!
भीष्म ने भी तो नहीं बोला था
जब पांच लोग खींच रहे थे
साड़ी उस औरत की,
और तब मैं मान लेता हूँ
“भीष्म” गंगा का ही “पुत्र” है!
तुम भूले भी मत बनना मेरे साथी,
न भीष्म! न पितामह!

Representational Image by Animesh Dutta.

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Quote of the day: “But just as the river is always at the door, so is the world always outside. And it is in the world that we have to live.”Lian Hearn, Across the Nightingale Floor

 

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